Wednesday, October 21, 2020

अपने आइडिया से गांव को कर रही हैं रौशन, गांव-घर घूमकर बायोगैस प्लांट लगवा रही हैं बिहार की आकांक्षा

हौसले बुलंद हो और मन में कुछ कर लेने की ठान लें तो कोई भी काम कठिन नहीं होता। कुछ वैसे हीं कार्यों में से एक बिहार की रहने वाली आकांक्षा सिंह ने कर दिखाया है। इनका जन्म शहर में हुआ और पालन पोषण भी शहरों में हीं हुआ लेकिन आकांक्षा सिंह ग्रामीण इलाकों के गरीब लोगों का दुख दर्द समझती हैं। आईए जानते हैं आकांक्षा सिंह किस तरह गांव को अपने कार्यों से बेहतर बना रही हैं…

आकांक्षा ने जमीनी स्तर पर गांव-गांव घुमकर लोगों के समस्याओं को सुना, देखा और महसूस किया। आकांक्षा सिंह 2014 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से सोशल इंटरप्रेन्योरशिप में मास्टर्स करने के बाद इंटर्नशिप करने के लिए मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले गई। आकांक्षा सिंह बताती हैं कि वे वहां दो हफ्ते रहीं और ये दो हफ्ते में उन्होंने देखा कि वहां के किसी भी घर में न तो शौचालय है और न ही ठीक से बिजली आती है। यहां तक कि महिलाएं रात होने से पहले ही सब काम कर लेती हैं। आकांक्षा सिंह ने यह भी देखा कि यहां की महिलाएं अभी भी गोबर के उपलों से खाना बनाती हैं और उस गोबर के उपलों से निकलती खतरनाक धुएं से परिवार का स्वस्थ खराब हो रहा था। यहां के किसान केमिकल वाले खाद और कीटनाशकों पर ज्यादा निर्भर थे। आकांक्षा सिंह बताती हैं कि ज्यादा केमिकल वाले खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल करने से मिट्टी में पीएच स्तर को खराब कर दिया था जिसके कारण इसकी उर्वरता प्रभावित हुई थी। यहां तालाब की भी ठीक से देखरेख नहीं थी। ग्रामीण लोग पूरे गांव के कचरे उसी तलाब में फेंका करते थे जिस तलाब से घरेलू कामों के लिए पानी लिया जाता था। गांव के लोग अपने पशुओं को धोने के लिए इसी तलाब में लाया करते थे।

यहां रसोई से बायोडिग्रेबल कचरे के लिए कोई प्रबंध नहीं था। आकांक्षा सिंह बताती हैं कि वहां जमा हुए बायोदिग्रेबल कचरे से मच्छर पैदा होते थे और इस मच्छर के काटने से लोगों को बीमारियों और पशुधन की हानि का दंश झेलना पड़ता था। मच्छर से बचने के लिए यहां के लोग चावल के भूसी जलाते थे। इस तरह से यहां के लोगों का जीवन चल रहा था। आकांक्षा सिंह कहती हैं कि भारत में ग्रामीण इलाकों के लिए विद्युतीकरण योजनाएं थी लेकिन यह क्षेत्र इस योजनाओं के लिए प्रभावी रूप से लागू नहीं हुई थी। यहां के ग्रामीण लोग खाद और कीटनाशकों की भुगतान अपनी जेब से कर रहे थे। इससे यहां के ग्रामीण लोगों की आजीविका बिगड़ रही थी। आकांक्षा सिंह ने कहा की मैंने महसूस किया कि यहां के किसान क्यूं बाहरी एजेंडों का भुगतान करें, जबकि वह अपने लिए खुद बिजली बना सकते हैं और इससे अपने कई समस्या को सुलझा सकते हैं।

यह भी पढ़े :-

कभी ख़ुद की ज़िंदगी गरीबी में काटनी पड़ी, अब 3000 लड़कियों को सिलाई के जरिये आत्मनिर्भर बना चुकी हैं

इन सारी समस्याओं को देखते हुए आकांक्षा सिंह के मन में बायो- इलेक्ट्रिसिटी का विचार आया। आकांक्षा सिंह कहती हैं कि यहां के आधिकांश लोग मवेशी पालन करते हैं। जिससे एक बायोगैस प्लांट आसानी से लगाया जा सकता है। इसमें खाद और बायोडीग्रेबल कचरे का उपयोग करके पूरे गांव में बिजली उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके अलावा बायोगैस के प्लांट से मिलने वाले गैस से महिलाओं की रसोई में मदद मिल सकती है। आकांक्षा सिंह ने स्वंयभू इनोवेटिव सल्शयुन प्राइवेट लिमिटेड परियोजना के बारे में विचार किया। यह परियोजना गरीब किसानो के परिवार की जिंदगी में रोशन करने की है। आकांक्षा सिंह ने इस परियोजना को अपने राज्य बिहार में चलाने के लिए फैसला किया। इन्होंने समस्तीपुर का एक इलाका चुना, जहां 50 घरों का एक दलित परिवार रहता था। उस इलाके में बिजली नहीं थी। यहां के लोग गरीबी में जीवन यापन कर रहे थे। आकांक्षा सिंह बताती हैं कि उनके लिए यह सब कर पाना कठिन था लेकिन इन्होंने अपने हौसलों को कभी पीछे हटने नहीं दिया। आज इन सभी परिवारों के घरों में बिजली है और इसके लिए उन्हें प्रतिमाह सिर्फ 60 रुपए की राशि का भुगतान करना पड़ता है।

आगे आकांक्षा सिंह बताती हैं कि यहां के लोगों को इस योजना पर विश्वास दिलाने में चार से पांच महीना लग गया। तब जाकर यहां के लोगों को इस योजना पर विश्वास हुआ। आकांक्षा सिंह कहती हैं कि जब उन्हें पता चला कि यहां के किसान धनी किसानों से जमीन लीज पर लिए थे और खेती के कामों के दौरान लगने वाले बिजली का खर्च के लिए वे किसान से 150 रुपए प्रति घंटा देने के लिए मजबूर करते थे जबकि स्वयं जमीदार 2 रुपए प्रति घंटा बिल भुगतान करते थे। आकांक्षा सिंह ने जब वहां के ग्रामीण लोगों को इस परियोजना के बारे में समझाने के बाद वहां प्लांट लगाने के लिए जमीन की तलाश शुरू की। अंततः यहां आकांक्षा सिंह की कोशिश कामयाब हुई। वहां के दूसरे समुदाय के एक व्यक्ति ने इस परियोजना के लिए अपनी जमीन दान कर दिया। वह व्यक्ति चाहता था कि यहां के दलित समाज बेहतर जीवन जिएं।

आकांक्षा सिंह ने इस परियोजना को सफल बनाने के लिए स्वयंभू के सह- संस्थापक आशुतोष कुमार और एक गैर- लाभकारी संगठन आयुष्मान फाउंडेशन को देती है। आज समस्तीपुर में दो बायोगैस प्लांट है। एक के पास 2 घंटे की बायो- इलेक्ट्रिसिटी क्षमता है और दूसरा 4 घंटे बिजली की आपूर्ति करता है। स्वयंभू के इस परियोजना को बनाने के लिए सिंगापुर के डीबीएस बैंक से फंडिंग मिली है। स्वयंभू टीम बायो- इलेक्ट्रिसिटी परियोजना को बढ़ाने के लिए काम कर रही है। यह संस्था ग्रामीण इलाकों तक बायो- इलेक्ट्रिसिटी पहुंचाने के लिए काफी मेहनत कर रही है। आकांक्षा सिंह बताती हैं कि यूपी और झारखंड में बायोगैस प्लांट का निर्माण चल रहा है। इसके अलावा हरिद्वार में निजी कंपनी के साथ मिलकर ग्रामीण क्षेत्रों में प्लांट बनाने में जुटी हैं।

आकांक्षा सिंह ने अपने कार्यों से जिस तरह लोगों की जिंदगी को प्रकाशित किया है और उसे सुलभ बनाया है वह प्रशंसनीय और प्रेरणादायक है।

Rajnikant Jha
Rajnikant Jha is a graduate lad from Bihar. He is looking forward to understand difficulties in rural part of India. Through Logically , he brings out positive stories of rural India and tries to gain attention of people towards 70% unnoticed population of country.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

सबसे लोकप्रिय

Bimla Munda Bimla Munda

जब हमारे देश में कोई योद्धा या खिलाड़ी देश के लिए जीत हासिल करता है तो बहुत खुशी का माहौल बनता है।...

पराली का उपयोग कर बना दिये खाद, आलू के खेतों में इस्तेमाल कर कर रहे हैं दुगना उत्पादन: खेती बाड़ी

इस आधुनिक युग मे हर चीजों में बदलाव हो रहा है। चाहे वह तकनीकी चीजें हों या अन्य कुछ भी। पहले किसान...

कामधेनु आयोग ने गाय के गोबर और मिट्टी से 33 करोड़ दीये बनाने का लिया संकल्प: आत्मनिर्भर भारत

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि बहुत जल्द दिवाली का त्योहार आने वाला है। दिवाली का त्योहार भारत के प्रमुख त्योहारों...

समाज के रूढ़िवादिता को तोड़ बनीं आत्मनिर्भर, यह सुपर Mom आज चलाती हैं शहर की सबसे बड़ी डांस अकेडमी: Seema Prabhat

कहते हैं- "कोई भी देश यश के शिखर पर तब तक नहीं पहुंच सकता जब तक उसकी महिलाएं कंधे से कन्धा मिला...