5 सालों से जोधपुर में रहकर जर्जर कुओं को पुनर्जीवित करने के पीछे पागल है यह विदेशी सैलानी

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पृथ्वी पर लगभग तीन चौथाई भाग पानी है। लेकिन हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं पीने का पानी कितना प्रतिशत है। जिस तरह जनसंख्या बढ़ोतरी हो रही है, पर्यावरण दुषित हो रहा है। लोग कुएं, नदी, तालाब, और अन्य जलस्रोत को कचरा, मृत मवेशियों आदि से प्रदूषित कर रहें हैं। इसलिए पेय जल के लिए हमें बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं कुछ महान पुरूष भी हैं जो ना कि सिर्फ जल संरक्षण में अपना सहयोग दे रहें हैं, बल्कि अपने कार्यों से लोगों को जागरूक करने के लिए मुहिम भी चला रहें हैं। आज की यह कहानी आयरिश पर्यावरणविद 71 वर्षीय पुरुष, फ्रांस में जन्मे कैरोन रॉन्सले की है, जो 6 वर्ष पूर्व भारत आये और तब से यहां के जल संसाधनो को प्रदूषित होने से बचा रहें हैं।

अगर हम कहीं घूमने के लिए जाते हैं तो वहां के दर्शनीय स्थलों को देख, तस्वीरों को कैद कर अपने आवास लौट आएंगे। लेकिन जब कैरोल इंडिया घूमने आए.. राजस्थान के जोधपुर में इन्हें जल स्रोतों को गंदा देख बहुत बुरा लगा और तब इन्होंने निश्चय किया कि यह उनकी सफाई करेंगे। अब तक कैरोन निम्न जल स्रोतों को साफ करने में कार्यरत हैं :- चंडपोल बावड़ी, राम बावड़ी, गुलाब सागर झील।

“भारत जल पोर्टल” के तहत इस बात की जानकारी मिली है कि जोधपुर चिड़िया टुंक की नीचे वाले हिस्से में स्थित है। गुरुत्वाकर्षण के कारण यहां बहुत आसानी से पानी पहुंच जाता है। बहुत साल पहले 1950 तक जल स्रोत स्टेपवेल, कुओं, झील, नहर और जलसेतु थी। राजस्थान रेगिस्तानी क्षेत्र होने के कारण पानी की ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है। अब यहां पंजाब के नदियों से पूरे साल पानी “इन्दिरा गांधी नहर” के माध्यम से भेजा जाता है।

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दादाजी इंडियन रेलवे में काम कर चुके हैं

कैरोन भारत को बहुत पसंद करते हैं। इनके दादा जी इंडियन रेलवे में “चीफ इंजीनियरिंग” के तौर पर कार्यरत रह चुके हैं। इसीलिए इनका लगाव इंडिया से बहुत ज्यादा रहा है। उन्हें यहां की वेश-भूषा और संस्कृति बहुत पसंद आई। वह इंग्लैंड लौट यहां की बहुत तारीफ किया करते थे जिससे मैं इंडिया की तरफ़ आकर्षित हो गया।

कैरोन पाकिस्तान में भी कर चुके हैं काम

कैरोन को भ्रमण करना बहुत अच्छा लगता है। यह 1998 में पाकिस्तान गयें और वहां भी 20 सालों तक रहकर पर्यावरण संरक्षण और सर्वशिक्षा अभियान के क्षेत्र में कार्य कर चुके हैं। वहां भी इनकी खूब सराहना होती है। पाकिस्तान में यह बहरे बच्चों को शिक्षा देते थे। शिक्षा देने के साथ-साथ यह पौधों का संरक्षण कैसे करना है? पौधों की देखभाल, उन्हें लगाना, उनका आकार कैसे बढ़ रहा है, यह सब उन बच्चों को सिखाते थे। पाकिस्तान में इनके साथ ब्रिटिश दूतावास में गलत व्यवहार किया गया। फिर भी इन्होंने कानून के नियमों का पालन करते हुए कोई गलत कदम नहीं उठाया। कराची के कुछ ग्रामर स्कूलों में भी इन्होंने पढ़ाया है। आगे यह राजस्थान के स्कूलों में गये और वहां भी पढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत रहे। इन्होंने यह सारा काम खुद के बल-बूते पर किया।

2014 में आए भारत

कैरोन ने 2014 में भारत भ्रमण करने का निश्चय किया और भारत आए। कैरोन भारत की व्यवस्था, संस्कृति और भाषा से आकर्षित होकर यहां आये थे। घूमते वक़्त राजस्थान के जोधपुर में जल स्रोतों को गंदा देखें। फिर इन्होंने यहां पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाया। शुरुआती दौर में बेयरफुट कॉलेज में ग्रेजुएशन के छात्रों को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक कर उनके साथ कार्यरत रहे। इन्होंने इस कॉलेज में “वाटर होस्टिंग” को सही करने का काम किये। कैरोन सौर ऊर्जा के साथ-साथ हर वर्ष सैकड़ों और हजारों पौधों को लगाते हैं। उन्हें इस काम में काफी आनंद मिलता है इसीलिए इस कार्य से लगे हुए हैं।

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जैसलमर में किया कार्य

इंडिया में घूमने के बाद यह जैसलमेर के एक गांव में गये और एक NGO के तहत वहां के किसानों को बगीचे के निर्माण और देखभाल में काफी मदद की।
यहां इन्होंने “वन विभाग” के साथ मिलकर लगभग 1000 से अधिक पौधे लगाए। लेकन इसमें यह असफल हुए। क्योंकि यहां के पशुओं ने इन पौधों को अपना आहार बना लिया और स्थानीय लोगों की मदद ना देने के कारण यह कार्य असफल हुआ।

जोधपुर आकर किया बावड़ी की सफाई

वहां भ्रमण करने के बाद कैरोन जोधपुर आए और यहां बावरियों को देख उनकी तरफ आकर्षित हुयें और उन्होंने यहां रुककर जल संरक्षण के लिए कदम आगे बढ़ाया। इन्होंने बावड़ी की सफाई के लिए नगर पालिका जैसी संस्थाओं से संपर्क किया लेकिन उन लोगों ने इनकी कोई मदद नहीं की। इनका संघर्ष देख कुछ स्थानीय लोगों ने इनके साथ कदम बढ़ाया। लेकिन बावरियों के आसपास फैली गंदगी को देखकर वह पीछे हट गयें। यहां गंदगी इतनी ज्यादा थी कि सफाई करने के दौरान लोगों को घुटन सी महसूस होती। जल स्रोतों की तरफ आकर्षण देख यहां के “मेहरानगढ़ म्यूज़ियम ट्रस्ट” ने इनकी मदद के लिए अपने कुछ मजदूर भेजें।

मेहरानगढ़ म्यूज़ियम ट्रस्ट के टीम मेंबर और INTACH जोधपुर चैप्टर के संयोजक ने दिया साथ

इंडिया में घूमने आने वाले एक व्यक्ति को इंडिया के जल स्रोतों के प्रति ऐसी लगाव देखकर, मेहरानगढ़ म्यूज़ियम ट्रस्ट के टीम मेंबर और INTACH जोधपुर चैप्टर के संयोजक ने इनका साथ दिये। इनकी मदद से कैरोन को कुछ जल स्रोतों के सफाई का जिम्मा दिया गया। इन बावरियों को साफ करने के लिए “पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट” ने इन्हें पम्प दिये। इस पंप की सहायता से पानी को बाहर निकालने का कार्य किया जाने लगा। इस पम्प के सहारे ज्यादा बिजली की खपत होती थी। इसलिए इन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

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प्रत्यूष जोशी ने किया समर्थन

कैरोन जो विदेश से आकर जोधपुर में जलाशयों की सफाई कर रहे थे। इससे आकर्षित होकर वहां के निवासी प्रत्यूषा जोशी ने इनको समर्थन किया और इनके साथ कार्य में लग गईं। प्रत्यूषा भी इनके साथ लगभग 1 साल तक कार्यरत रहीं। इनके कार्यों की सराहना बहुत से लोगों ने की। कैरोन ने कुछ बच्चों की टीम बनाई और उनके द्वारा बावरियों की सफाई करने लगें। ट्रस्ट अपनी तरफ़ से 5-10 मजदूर को ही इनकी सहायता के लिए भेजती है। जलसयों की सफाई का पूरा जिम्मा ट्रस्ट और  INTACH के सदस्य उठाते हैं। आर्थिक स्थिति से लेकर कितने मजदूरों की ज़रूरत है यह सारे कार्य ही देखते हैं। हर कुछ महीने में ट्रस्ट सैकड़ो सदस्यों से अधिक सदस्यों के साथ मिलकर इन कार्यों की शुरुआत बड़े पैमाने पर करता है।

20-50 ट्रॉली का उपयोग कर रहे हैं सफ़ाई

जलाशयों के पास फैले कचरों की सफाई के लिए लगभग 20 से 50 ट्रॉली का उपयोग किया जाता है और इनकी मदद से कचरा को हटाया जाता है। साथ ही अगर कचरा अधिक मात्रा में हो तो 8-10 ट्रैक्टर का भी सहयोग लिया जाता है। स्कूली बच्चों के लिए पिकनिक के योग्य स्थान बनाने के लिए भी यह कार्यरत है। अगर यह पूर्णतः साफ हो जाए तो वहां बच्चे अपने पिकनिक का आनंद भी ले सकते हैं।

एक 71 वर्षीय व्यक्ति जो इंडिया भ्रमण करने आया और इंडिया के जल स्रोतों, पर्यावरण संरक्षण के लिए बिना किसी लालच के कार्य में लग गया। The Logically कैरोन के कार्यों की सराहना करते हुयें इन्हें नमन करता है। साथ ही अपने पाठकों और भारतवासियों ने विनम्र निवेदन करता है कि वह भी प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल करें।

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