Thursday, January 20, 2022

रात में सीते हैं जूते और दिन में करते हैं पत्रकारिता , पढ़िए सुरेश नंदमेहर की कहानी !

एक तो काबिलियत इंसान के अंदर निहित होती है या फिर दूसरा आवश्यकता के अनुसार इंसान अपने प्रयास से खुद को काबिल बनाता है ! हालातों से जूझने के परिणामस्वरूप अपने प्रयास से खुद को काबिल बनाने का एक बेजोड़ उदाहरण पेश किया है भोपाल के रहने वाले सुरेश नंदमेहर ने जो रात में जूते सीते हैं और दिन में पत्रकारिता करते हैं ! आईए जानते हैं उनकी कहानी जिन्होंने अपने प्रयासों से प्रेरणा का संचार किया है !

भोपाल के एक गाँव के रहने वाले सुरेश नंदमेहर अपने पिता के साथ गाँव में हीं खेती का काम करते थे ! इसके बाद वे अपने परिवार के साथ भोपाल शहर आ गए ! भोपाल आकर उनके सामने जीविकोपार्जन की समस्या थी ! उन्होंने वहाँ देखा कि उनके कई रिश्तेदार भोपाल में हीं रहकर जूते सीने का काम कर रहे थे ! सुरेश के मन विचार आया कि क्यूँ ना यही काम किया जाय ! बस बिना देर किए सुरेश ने जूते सीने का काम शुरू कर दिया !

कैसे आया पत्रकारिता का विचार

सुरेश नंदमेहर अपने पत्रकारिता की जरूरत और उसकी शुरुआत के बारे में कहते हैं “हमलोग आराम से जूते सीने का काम कर रहे थे और जो रूखा-सूखा हो पाता था उसे पाकर अपनी जिंदगी जी रहे थे ! एक दिन नगर निगम वालों ने हमलोगों की दुकानें, हमारे घरों को हटाने लगे , इस घटना के बाद मैं 27 दिनों तक निरन्तर रूप से धरने पर बैठा रहा लेकिन उसका कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा और बिना कोई हल निकले हुए मुझे धरना खत्म करना पड़ा” ! अखबार और प्रेस में इस खबर को नहीं आने शासन और प्रशासन भी इस ओर ध्यान नहीं दिया ! इस घटना ने सुरेश को झंकृत कर दिया और उन्होंने विचार किया कि अब वे खुद का अखबार निकालेंगे जिससे हमारे जैसे गरीब और साधारण लोगों की आवाज शासन-प्रशासन तंत्र पहुँचाया जा सकेगा !

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“बाल की खाल” अखबार की शुरुआत

अपने खुद का अखबार निकालने के बारे में जब सुरेश ने लोगों को बताई तो लोगों ने कहा कि तुम कैसे बनोगे पत्रकार और कौन सुनेंगे तुम्हारी आवाज ! तुम एक चर्मकार हो , छोटे तबके से हो, तुम्हारी आवाज कोई नहीं सुनेगा ! लोगों की इन नकारात्मक बातें भी सुरेश की मंशा और उनका उद्देश्य नहीं बदल सकी ! उन्होंने अपने एक मित्र जो एक पत्रकार हैं उनसे सहायता ली और पत्रकारिता की बारिकियों को सीखा ! अखबार का टाइटल भी उसी दोस्त ने दिया ! सुरेश ने अपनी दुकान रोककर पत्रकारिता सीखी ! बाल की खाल नाम से सुरेश ने एक अखबार निकाला लेकिन कुछ हीं दिन बाद उसे मासिक मैगजीन में परिवर्तित कर दिया ! दरअसल सुरेश को अखबार से ना के बराबर पैसा निकल पा रहा था उसी बीच सरकार ने कहा कि अगर आप अपने अखबार को मैगजीन में बदल देंगे हम आपको प्रचार देंगे ! इन सबको देखते हुए अखबार को मैगजीन का रूप दे दिया गया !

सुरेश का आर्थिक संघर्ष जारी

सुरेश अपनी पत्रकारिता को इमानदारी की कसौटी पर कसे हुए हैं ! जहाँ आज छोटे स्तर पर अखबार निकालकर कहीं अधिक पैसे कमाए जा रहे हैं वहीं सुरेश को आज मासिक मैगजीन से कोई आमदनी नहीं होती क्यूँकि वह लीक से हटकर पत्रकारिता को आय का साधन बनाना नहीं चाहते ! सुरेश को आज भी आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है ! खासकर बरसात के मौसम में समस्या बढ जाती है ! बरसात के मौसम में जूते का काम कम जाता है ! इसलिए उन्हें बरसात मौसम के लिए उन्हें अपने जीविका के लिए पहले हीं व्यवस्था करनी पड़ती है !

सकारात्मक सोंच के साथ कार्य जारी

अब तक जूते सीने के कार्य से उनका और उनके परिवार का जीवन किसी तरह चल जाता है और मैग्जीन के कार्य से मिलने वाले पैसे कम होने के कारण सारा पैसा मैगजीन के कामों में हीं लग जाता है ! निरन्तर कठिन परिश्रम के पश्चात उनके आर्थिक हालात जस का तस है ! इतनी सारी समस्याओं से जूझते हुए सुरेश का जज्बा कायम है ! वह हार मानने वालों में नहीं बल्कि संघर्ष करने वाले शख्स हैं ! उनका मानना है कि मेरा काम एक ना एक दिन अवश्य सफलता का परचम लहराएगा !

सुरेश नंदमेहर ने अपने कार्यों से समाज में प्रेरणा की ऐसी किरण बिखेरी है जो लोगों के लिए पथप्रदर्शक का काम करेगा ! Logically सुरेश नंदमेहर को नमन करता है !