Thursday, October 29, 2020

IIT से पढाई करने के बाद शुरू किए आचार का कारोबार, अब दूसरे राज्यों में भी बेचते हैं अपना प्रोडक्ट

अगर कोई अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ खेती-बाड़ी, पहाड़ों को काटकर रास्ता बनना, झीलों को साफ करना या बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने का कार्य करता है, तो बहुत से सारे ताने सुनने को मिलते हैं। कुछ लोग उन्हें पागल कहते हैं तो कुछ पढ़ा-लिखा गंवार।

हमें महिलाओं के बारे में जानकारी है कि वह खाना अच्छा बनाती हैं या अचार मुरब्बा अच्छा बनाती है। लेकिन आज की कहानी ऐसे व्यक्ति की है जो अंजीर और मशरूम का अचार बनाते हैं। इनके द्वारा बनाए अचार के स्वाद का मुरीद आज हर कोई है। यह युवक ITI प्रशिक्षित है। इन्होंने अपना व्यापार पहाड़ के उत्पाद से प्रारंभ किया था।

लोगों का रुझान खेती की तरफ़ ज्यादा हो रहा है। लोग शहरों से आकर गांव में रहकर खेती तरफ रुख मोड़ रहें हैं। ज्यादातर खेती जैविक खेती हो रही है। इसमें जैविक उर्वरक की मदद से फसलों को उगाया जा रहा है।

अंजीर और मशरूम की आचार तैयार करने वाले दीपक बोरा

कोरोना काल के दौरान हर जगह परेशानी का माहौल बना है। कुछ लोगों के पास खाने के पैसे हैं लेकिन समान खरीदने से डरते हैं ताकि वह कहीं कोरोना से संक्रमित न हो जायें। कुछ व्यक्तियों के पास न घर है, न कपड़ा, ना ही खाने के लिए एक वक्त की रोटी। बहुत से लोग कोरोना से मर रहें हैं तो वहीं कुछ लोग भुखमरी और लाचारी से। इस दौरान कई कम्पनियां भी बंद हो चुकी है। कुछ लोग बेरोजगार हो अपने घर आकर बैठ गयें हैं। इसी दौरान उत्तराखंड (Uttarakhand) के अल्मोड़ा (Almora) ज़िलें में स्थित सोमेश्वर घाटी के निवासी दीपक बोरा (Deepak Bora) ने एक अनोखा कार्य किया है जिससे वह लोकप्रिय हो गयें हैं। ये जंगली फल “अंजीर” एवं “मशरूम”से अचार बनाकर लोगों को बेच रहें हैं।

तिमल जो अंजीर का पहाड़ी नाम है। इसे इंग्लिश में एलीफेंट फिग कहते हैं। यह पहाड़ पर या खेतों की किनारे मेड़ पर खुद उगते हैं। इसे उगाने की जरूरत नहीं होती है। इसकी पत्तियां बड़ी होती है जिस कारण इसे पशु के लिए उपयोग किया जाता है। इसमें भरपूर मात्रा में औषधीय गुण और पौष्टिकता मौजूद होती है। अंजीर फल नहीं बल्कि इंवरटेड फूल है।

महानगरों के लोगों को भी है पसन्द है यह अचार

आज दीपक के अचार का स्वाद बहुत लोग चख चुकें हैं। इन्होंने उन सबको अपने स्वादिष्ट अचार का मुरीद बना लिया है। इनका अचार सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं बहुत से शहरों का डिमांड हो गया है। इनके बनाए अचार दिल्ली मुम्बई में बेचे जा रहे हैं। यह आम और लहसुन का अचार तैयार वैरायटी के तौर पर लोगों को देते हैं। इतना ही नहीं दीपक पुरानी विधि उपयोग कर सिलबट्टे पर नमक पीसने का कार्य 6 वर्षों से कर रहें हैं। इनके द्वारा तैयार किया हुआ नमक ऑनलाइन बिक रहा है।

अन्य परिवार को भी दिए रोजगार

अपनी 12वीं की पढ़ाई संपन्न करने के बाद दीपक ने आईटीआई की पढ़ाई की। आईटीआई पूरी हुई लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिल रही थी। इसलिए उन्होंने सोचा कि मैं खुद का बिजनेस शुरू करूंगा। वर्ष 2015 में उन्होंने पहाड़ी नमक का बिजनेस प्रारंभ किया। यह पैकेट में नमक पैक तो करते थे लेकिन मटके में भी नमक को पैक करना शुरू कर दिया। मटके के अंदर पहाड़ी नमक को रखा जाता था। उत्तराखंड में इनके इस कार्य को लोगों ने खूब पसंद किया। इस नमक की खूब बिक्री हुई। फिर इन्होंने अचार बनाना शुरू किया। कटहल, लहसुन, मशरूम और अंजीर से। हालांकि इनके पास पैसे की कमी होने की वजह से इन्होंने अपने दोस्त से मदद मांगी और उसने मशरूम का बीज मिलाकर इन्हें दिया। मशरूम का बीज दीपक ने अपने घर पर लगाया और यह सफल भी हुआ। एक युवक और दो महिलाओं के साथ मिलकर दीपक ने इस लॉकडाउन में घर पर ही अचार बनाने की प्रक्रिया शुरू की।

अन्य युवक को भी कर रहें है जागरूक

दीपक की ऐसी सफलता देखकर अगल-बगल के गांव के कुछ युवाओं ने भी मशरूम की खेती शुरू कर दी है। उन्हें भी अच्छा उत्पादन मिल रहा है। दीपक अपने कार्य के साथ-साथ युवक को खेती की जानकारी देते हैं और उन्हें भी खुद का बिजनेस स्टार्ट करने के लिए जागरूक करते हैं। दीपक का मानना है कि अगर हम किसी शहर में जाकर नौकरी करेंगे तो ज्यादा-से-ज्यादा 18-20 हजार तक की नौकरी मिलेगी, लेकिन हम अपने घर में रहकर अपना खुद का व्यापार शुरू करें तो इससे हमारे गांव का नाम भी रोशन होगा। साथ ही हमारा पहाड़ी क्षेत्र भी उपजाऊ होता रहेगा।

The Logically दीपक के पहाड़ के फल और अपना व्यापार स्थापित करने के साथ लोगों को भी स्वरोजगार के लिए जागरूक करने के लिए सलाम करता है।

Khusboo Pandey
Khushboo loves to read and write on different issues. She hails from rural Bihar and interacting with different girls on their basic problems. In pursuit of learning stories of mankind , she talks to different people and bring their stories to mainstream.

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