Tuesday, April 20, 2021

लोगों के घर से समान इकठ्ठा कर बेचती हैं, और उस पैसे से जरूरतमंद बच्चों के फीस चुकाती हैं: Re store

बेंगलुरू.. भारत के कर्नाटक राज्य की राजधानी.. देश के बड़े शहरों में से एक.. ऊंची-ऊंची इमारतें.. बड़े-बड़े मॉल, इंडस्ट्री, स्कूल व अस्पताल.. सड़क पर चलती अनगिनत गाडियां.. इन सब के बीच शहर की चकाचौंध में गुम हुए कुछ गांव और बस्ती.. जहां की कहानी शहर से बिल्कुल अलग..

आज की हमारी कहानी है सोशल वर्क में रूचि रखने वाली देवयानी त्रिवेदी (Devyani Trivedi) की

कुछ साल पहले देवयानी त्रिवेदी (Devyani Trivedi) बेंगलुरू रहने पहुंची। वहां वाइटफील्ड में रहने लगी। वाइटफील्ड के पीछे एक छोटा-सा गांव है। नाम है विजय नगर। वाइटफील्ड और विजय नगर के लोगों की ज़िंदगी में जमीन आसमान का फर्क है। एक वो जिनके पास सब कुछ है। दूसरे वे जिसके पास कमी ही कमी है। ऐसे गरीब और ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए वाइटफील्ड राइजिंग एक सोशल ग्रुप बनाया गया। इसे वहीं के कई अलग-अलग लोगों ने मिलकर बनाया था। देवयानी को भी सोशल वर्क में बेहद रूचि रही है। इसलिए इन्होंने इस ग्रुप से बातकर एक क्लॉथ डोनेशन ड्राइव आयोजित किया। वाइटफील्ड राइजिंग ग्रुप ने देवयानी को ऐसे लोगों से जोड़ा जिन्होंने इन्हें कपड़े डोनेट किए। अब देवयानी के पास ढ़ेर सारे कपड़े इकट्ठे हो गए थे।

ज़रूरतमंद लोगों के आत्मसम्मान के बारे में सोचकर ‘री-स्टोर’ खोलने का फैसला किया

आमतौर पर सोशल वर्क करने वाले लोग ज़रूरतमंदों की मदद करते वक़्त उन्हें लंबी लंबी लाइनों में लगाते हैं। उन्हें ज़रूरत का समान देते हुए 4-5 समृद्ध लोग उस एक सामान को पकड़कर तस्वीर लेते हैं। फिर चले जाते हैं। पर देवयानी ऐसा नहीं चाहती थी। इनका मानना है कि ज़रूरतमंद लोगों को भी पूरे सम्मान के साथ अपने लिए चीजें चुनकर लेने का अधिकार है। इसलिए इन्होंने ‘री-स्टोर’ खोलने का फैसला किया। अपने इस फैसले को पूरा और सही साबित करने के लिए सबसे पहले देवयानी ने एक छोटी-सी दुकान किराए पर ली। वहां स्टोर शुरू की। डोनेशन में मिले सभी सामानों को अपने री-स्टोर में सजाई। बिल्कुल वैसे ही जैसे दुकानों में अलग-अलग कैटेगरी बनाकर चीज़ों को व्यवस्थित किया जाता है। बच्चे-बड़े, महिला-पुरुष सभी के लिए कपड़े, बेडशीट, पर्दे, स्टेशनरी के सामान, बच्चों के लिए गेम्स, यहां तक की बर्तन, इलेक्ट्रिकल सामान और फर्नीचर भी इस री-स्टोर से लिया जा सकता है।

सिर्फ़ गरीब ही नहीं कोई भी के सकता है इस री-स्टोर से सामान

देवयानी बताती है, ऐसा नहीं है कि इस री-स्टोर से सिर्फ़ गरीब ही सामान ले सकते हैं। यहां से कोई भी 5 रुपये से लेकर 500 रुपये तक की चीज़ें खरीद सकता है। मात्र 30-40 रुपये में महिलाएं अपने लिए कुर्ती ले सकती हैं। 80-100 रुपये में जीन्स मिल जाते हैं। बेडशीट और पर्दे भी किफायती दामों में मिलते हैं। बच्चों के लिए मिलने वाले तरह-तरह के गेम्स, पजल, किताबें और दूसरे सामान भी यहां से सस्ते दामों में खरीदा जा सकता है। कुछ बच्चे तो स्टोर में मदद भी करते हैं। अपने पुराने सामान स्टोर में जमा करते हैं और उसके बदले अपनी पसंद का खिलौना ले जाते हैं।

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लोगों को रीसायकल, रीयूज और रीस्टोर के कांसेप्ट को समझाने की कोशिश

देवयानी कहती हैं, “हमारा मकसद लोगों को रीसायकल, रीयूज और रीस्टोर के कांसेप्ट को समझाना है। कई बार ऐसा होता है कि बाज़ार/ मॉल से सामान लाकर हम अपने घर को भर लेते हैं। फिर कुछ दिन बाद हम उसे बेकार और फ़ालतू समझने लगते हैं। मेरे अनुसार ये बिल्कुल ही गलत तरीका है। इससे हमारे पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है।” देवयानी अपने री-स्टोर के जरिए लोगों को यही बात समझाने की कोशिश कर रही है।

‘री-स्टोर’ है न कि कोई ‘डंपिंग स्टोर’

देवयानी आगे कहती हैं कि जब भी पुराने सामानों के पुनः उपयोग की बात आती है, हम उसे गरीबी से जोड़ देते हैं। फिर घर में पड़े फटे-पुराने कपड़े, टूटी-फूटी क्राकरी या बच्चों के खिलौने कुछ भी जिन्हें हम अपने घर में कचरा समझते हैं, उसे री-स्टोर के लिए भेज देते हैं। वह कहती हैं, “यह ‘री-स्टोर’ है न कि कोई ‘डंपिंग स्टोर’.. यहां री-स्टोर के लिए सिर्फ वही चीजें ली जाती हैं जो बिल्कुल सही और इस्तेमाल करने योग्य होती हैं।”

री-स्टोर के अलावा भी करती हैं गांव और बस्ती के लोगों की मदद

स्टोर से जो भी कमाई होती है उससे स्टोर का किराया दिया जाता है। वहां काम करने वाले कर्मचारियों को सैलरी दी जाती है। कुछ महिलाएं वहां सिलाई-कढ़ाई का काम करने के लिए भी है। उन्हें भी पैसे दिए जाते हैं और कभी-कभी स्टोर के समान भी। इसके अलावा देवयानी ने तीन लड़कियों का दाखिला एक प्राइवेट स्कूल में भी कराया है। ये पढ़ने में बहुत ही होशियार हैं लेकिन पैसों के तंगी की वजह से अब तक सरकारी स्कूल में पढ़ रही थी। देवयानी सरकारी स्कूलों की भी मदद करने की कोशिश करतीं हैं। इतने समय में गांव और बस्ती वालों से देवयानी की अच्छी जान पहचान भी हो गई है तो अब वे ख़ुद भी अपनी समस्या इनके पास लेकर आते हैं। देवयानी सबकी मदद भी करतीं हैं।

मेरे-आपके.. संक्षेप में कहें तो हम सभी के घर में कुछ ऐसी चीजें होती हैं जो इस्तेमाल करने योग्य है लेकिन हम उनका इस्तेमाल नहीं करते। वैसे सामान किसी और के उपयोग में आ सकते हैं। इस अच्छी सोच से देवयानी ने री-स्टोर शुरू किया। समाज में फैली अनगिनत नकारात्मक क्रियाकलापों के बीच इस अच्छी सोच को बढ़ावा देने के लिए The Logically देवयानी (Devyani) को शत शत नमन करता है। साथ ही अपने पाठकों से अनुरोध करता है कि आप भी ज़रूरतमंद लोगों की सहायता करें। अच्छा लगता है।

Archana
Archana is a post graduate. She loves to paint and write. She believes, good stories have brighter impact on human kind. Thus, she pens down stories of social change by talking to different super heroes who are struggling to make our planet better.

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