Sunday, September 19, 2021

पेशे से गार्ड हैं और 5000 से अभी अधिक शहीदों के परिवार को लिख चुके हैं ख़त, शहीदों के परिवारों से जुड़े रहने का है शौक

हमारे आस-पास घट रही घटनाओं को हम कितने दिन तक याद रखते हैं? ज्यादा से ज्यादा 1-2 हफ्ते या फिर 1-2 महीने। फिर क्या, सब अपनी जिंदगी और काम में व्यस्त हो जाते हैं। किसी सैनिक के शहीद होने की बात हो या किसी मासूम जानवर के साथ कुछ बुरा होने की बात हो, ये सारी बातें सिर्फ कुछ समय के लिए ही लोगों के बीच चर्चा में बनी रहती है।

लेकिन राजस्थान के भरतपुर जिले के रहने वाले जितेंद्र सिंह, हमारे देश के लिए शहीद हुए जवानों को हमेशा अपने ज़हन में ज़िंदा रखते हैं। वे कई शहीद जवानों जवानों के परिवार वालों को पत्र लिखते हैं, उनसे फोन पर बातें करते हैं और कुछ जवानों की तो उन्होंने मूर्तियां भी बना रखी हैं। उनके पास 5171 शहीद जवानों की जानकारियां हैं। इतना तो हमें गूगल पर भी ना मिले, वहां भी हमें कुछ शहीदों के ही नाम मिलते हैं। और जितेंद्र के पास हमारे देश के लिए शहीद हुए जवानों के नाम और फोटो तो है हीं, साथ हीं साथ उनके घर का पता भी है।

जितेंद्र बताते हैं कि वे राजस्थान के भरतपुर जिले के हैं। जहां उन्हें शुरुआती समय से हीं देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले लोग मिले। यहां के ज्यादातर युवा ब्रिटिश काल में भी फौज में भर्ती हुआ करते थे। जितेंद्र के पिता भी एक फौजी ही थे।




1999 में कारगिल युद्ध के दौरान कई सैनिक शहीद हो गए। 13-14 जवान जो जितेंद्र के गांव के ही थे। उनका शरीर तिरंगे में लिपटा आते देख और जवानों में देशभक्ति की भावना देखकर जितेंद्र भी काफी प्रेरित हुए। उसी दौरान एक जवान का मृत शरीर जब उसके घर पर आया तो उस शहीद के पिता ने कहा- “बेटा गया तो क्या हुआ देश तो सलामत है”। इन पंक्तियों ने जैसे जितेंद्र के मन में देशभक्ति की भावना गोल सी दी हो। जितेंद्र ने सोचा यह एक विस्मरणीय इतिहास है, जिसे संजोकर रखा जाना चाहिए। फिर उन्होंने शहीदों की जानकारी संग्रह करनी शुरू कर दी और ब्रिटिश काल, वर्ल्ड वॉर से लेकर अब तक की 5000 से भी ज्यादा शहीद जवानों की जानकारीयां है उनके पास। उन्होंने 50 जवानों की मूर्तियां भी बनाइ और 11 क्विंटल कागज उनके पास ऐसे हैं जिसमें सिर्फ शहीदों की जानकारियां हैं।

कारगिल युद्ध के दौरान देश में मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे। तब जवान अपने परिजनों को चिट्टियां लिखकर ही उनका हाल समाचार लिया करते थे। जिसे घर तक पहुंचने में काफी वक्त लगते थे। शहीद हुए जवानों के द्वारा लिखी गई अंतिम चिट्ठी उनके घर तब पहुंची, जब उनका दाह संस्कार हो चुका था, उनके परिवारों को मुआवजा तक मिलना शुरू हो चुका था। एक शहीद जवान की उस आखिरी चिट्ठी में लिखा हुआ था- “पिताजी मैं यहां ठीक हूं, आप कैसे हैं ये लिखना”। यह चिट्ठी पढ़कर सबकी आंखें नम हो गई।




तभी से जितेंद्र ने सोचा कि यह शहीद जवान की आखिरी चिट्ठी नहीं है। इनके परिजनों को मेरी चिट्टियां हमेशा मिलती रहेंगी। फिर 15 पैसे के जमाने से ही जितेंद्र शहीद परिवारों को चिट्टियां लिखने लगे और आज देश में 5171 शहीद जवानों के परिजनों से इनका सीधा संपर्क है और जितेंद्र उन परिवारों को यह अहसास दिलाते हैं कि पूरा देश उनके साथ है। शहीदों के परिवार वालों को भी खुशी होती है कि उन्हें अब भी कोई याद करता है। क्योंकि 1962, 1965, 1975 के शहीद जवानों का नाम उनके गांव में भी किसी को याद नहीं है।

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वर्ष 2000 में जब कारगिल विजय दिवस का अवसर आया, तब उन्हें पता चला कि दिल्ली में इंडिया गेट पर कारगिल विजय दिवस मनाया जाएगा और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी। उन्होंने सोचा कि मैं भी जवानों को श्रद्धांजलि देता सकता हूं। फिर गांव के बस अड्डे पर सभी शहीद जवानों की फोटो लगाकर जितेंद्र खड़े रहे। उनके पास मोमबत्ती और फूल लेने तक के भी पैसे नहीं थे और गांव का भी कोई और व्यक्ति शहीदों को श्रद्धांजलि देने नहीं आया। क्योंकि तब तक सब कारगिल को भूल कर अपनी जिंदगी में वापस लौट चुके थे। सिर्फ अकेले जितेंद्र ने फोटो निकलवाई और वहां लगाया। जितेंद्र ने रात के 11 बजे तक इंतजार किया कि कोई तो आए श्रधांजलि देने लेकिन कोई ना आया। फिर सारे जवानों की फोटो लेकर वे घर वापस आ गए। लेकिन बाद के सालों में सब फूल मोमबत्ती लेकर वहां आने लगे शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए। और गांव वालों ने शहीदों के सम्मान में उस जगह का नाम कारगिल चौक रख दिया और जितेंद्र को मेजर साहब कह कर बुलाने लगे। जितेंद्र भी फौज में ही भर्ती होना चाहते थे लेकिन 1 सेंटीमीटर की लंबाई कम होने के कारण उन्हें सैनिक बनने का मौका ना मिला।




वर्ष 2004 में पोस्टकार्ड का दाम बढ़ने पर उन्हें परेशानी आई। क्योंकि तनखा कम थी और शहीदों की जानकारी संग्रह करके रखने के लिए समाचार पत्र, रजिस्टर, पोस्ट कार्ड चाहिए थे, तो इसके लिए पैसे की जरूरत थी। जितेंद्र ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख निवेदन किया कि पोस्ट कार्ड के पैसे ना बढ़ाए जाएं क्योंकि मैं सारे शहीदों के परिवार वालों को चिट्ठी लिखता हूं। लेकिन इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई। उस वक्त जितेंद्र गांव के आसपास हीं नौकरी किया करते थे। फिर वर्ष 2008 में वे सूरत आ गए और एक प्राइवेट स्कूल में गार्ड की नौकरी करने लगे जहां उनकी तनखा महज 10,000 रही। जो कि इस कोरोनाकाल में घट कर 5000 हो गयी है। फिर भी उन्होंने अपनी देशभक्ति को अदब रखा है।

अब इनकी कहानी 5 शहीदों की किताबों में आ चुकी है। एक किताब में इनका जिक्र खुल किया गया है जिसका नाम है “कारगिल- अनटोल्ड स्टोरी”। बजाज कंपनी वाले भी जब इनके गांव में आए तो उन्होंने भी वह सारे पत्र, फोटो और मूर्तियां देखीं। जिससे प्रभावित होकर उन्होंने जितेंद्र से पूछा कि “बजाज आपके लिए क्या कर सकता है?” जितेंद्र का जवाब था “बस मुझे कुछ शहीदों के परिवार वालों से मिलना है जो मुझे बहुत दिनों से मिलने के लिए बुला रहे हैं, लेकिन मैं असक्षम हूं। आप मुझे बस उन परिवार वालों से मिलने में मदद करें”। फिर बजाज ने भी उन्हें कई शहीद परिवार वालों से मिलवाने का खर्च उठाया।




जितेंद्र को शहीद परिवारों को पत्र लिखते लगभग 21 साल हो गए हैं। इन 21 सालों में लगभग 50 लोग आए। जिन्होंने कहा कि वे भी पत्र लिखेंगे। लेकिन 5 से 10 पत्रों के बाद हीं उन्होंने पत्र लिखना छोड़ दिया और यह कहने लगे कि “ये इंसान तो पागल है हीं, हम भी पागल हो गए हैं।

वर्ष 2012 में शहीदों को पत्र लिखते लिखते जितेंद्र की एक आंख खराब हो गई। फिर भी वे अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे और पत्र लिखना जारी रखा। जब सूरत के आईआईटी के विद्यार्थियों को जितेंद्र के बारे में पता चला तो उन्होंने भी जितेंद्र से मिलकर कई पत्र लिखे और साथ हीं 20 लाख रुपए इकट्ठा कर भारत के सैनिकों के लिए दान किए।

जितेंद्र में देशभक्ति की भावना इस कदर दौड़ती है कि उन्होंने अपने बेटे का भी नाम एक शहीद जवान के नाम पर ही रखा है। और उनका सपना है कि जिंदगी में शहीदों के लिए एक हॉल ज़रूर बनवाएं, जहां सभी शहीदों के फोटो और नाम अंकित कर सकें। इनके इस नेक कार्य और विचारों ने इन्हें कई जगह सम्मान भी दिलाया है। अक्षय कुमार ने भी इन्हें सम्मानित करते हुए कहा कि जितेंद्र के जीवन की कहानी पर एक फिल्म बनेगी और उम्मीद है कि वह फ़िल्म हमारे देशवासियों के दल में देशभक्ति की भावना को और भी ऊंचा दर्जा देगी।

The Logically के लिए इस कहानी को स्वाति सिंह ने लिखा है, स्वाति BHU से जर्नलिज्म की कोर्स कर रही हैं और अपने लेखनी से सामाजिक मुद्दों को दिखाने की कोशिश करती हैं।