Saturday, July 31, 2021

तीन साल पहले माँ चल बसीं अब 8 साल की पलक अपनी छोटी बहनों के लिए चूल्हा फूंकती है और खाना पकाती है

कुछ नही बचा है साहब , सब खत्म हो गया। माँ का देहांत तीन वर्ष पहले हो हो गया था और अब इस नई विपदा के कारण सही से दो वक्त की रोटी भी नही जुड़ पाती है।

इन तीनों बच्चों को शायद इतनी बुरी ज़िन्दगी नही मिलनी चाहिए थी । मात्र 8 वर्ष की पलक एक बच्ची की तरह नही जी सकती क्योंकि उसे अपनी छोटी बहनों के लिए चूल्हे-चाकी , बर्तन और खाना पकाने का काम करना होता है । वही अपनी छोटी बहनों के लिए रोटी सेंकती है और वही सबको खाना खिलाती है, वक्त और ज़िम्मेदारियों ने उसे बचपन मे ही माँ बना दिया।

सुरेश गाजियाबाद के एक संकड़ी गली में रहते हैं , इनकी पत्नी का देहांत 3 वर्ष पहले ही हो चुका है और इनके तीन बच्चे हैं जिनका भरण-पोषण इन्हें अकेले करना होता है । 12*16 फ़ीट के कमरे में इनका पूरा परिवार रहता है जो किसी तरह से अपना भरण पोषण कर पाते हैं।

सुरेश दिहाड़ी मज़दूरी पर काम करते हैं और सुबह होते ही अपने काम के लिए निकल जाते हैं , क्योंकि रात के लिए भोजन का इंतज़ाम इनकी दिन के मेहनत के बाद ही सम्भव हो पाता है । बच्चों के परवरिश को लेकर हर पल एक चिंता बनी रहती है कि उनकी ज़िंदगी कैसे चलेगी , और बदहाली में मजदूरी करने वाले सुरेश भी अक्सर बीमार ही रहते हैं।

#ईन्सान_से_बडी_ईन्सानीयत_होती_है
#AmritVarshaNGO

Posted by Ravi Tripathi on Saturday, 11 July 2020

परिस्थिति का संज्ञान लेते हुए अमृत वर्षा NGO के संस्थापक रवि त्रिपाठी इन बच्चों से मिलने इनके घर गए और साथ मे कुछ राशन सामग्री भी ले गए।
रवि के अनुसार – 3 साल के ज़िया के शरीर पर वस्त्र के नाम पर केवल एक फ़टी बनियान बची थी और वह मुझे एकटक देखे जा रही थी। मैं इनकी बदहाली को देखकर सदमे में था लेकिन इन बच्चों को अभी ज़िन्दगी की परख ही कहाँ , ये अपनी धुन में मग्न थे।
खूंटी पर टंगी स्कूल के यूनिफार्म के तरफ इशारा करते हुए मैंने पूछा कि कहाँ पढ़ते हो – 8 साल की सबसे बड़ी बेटी ने बताया कि माँ के मरने के बाद हमारा स्कूल छूट गया , पिछले 2 सालों से हम स्कूल नही जाते । क्योंकि पूरा दिन भोजन के इंतेज़ाम में गुज़र जाता है और हमें पढाने वाला अब कोई नही है।

Logically से बात करते समय रवि त्रिपाठी ने बताया कि परिवार को उन्होंने थोड़ा-बहुत खाने का राशन दिया है , लेकिन यह किसी भी तरह से पर्याप्त नही था । अगर हम इन बच्चों को थोड़ा मदद कर पाते हैं तो इनकी ज़िन्दगी सुधर सकती है।

इन बच्चों की परिस्थिति को देखते हुए इनको मदद पहुंचाने के लिए Logically ने एक मुहिम की शुरुआत की है जिससे उनके लिए जरूरी सामान और उनके पढाई की शुरुआती व्यवस्था कराई जा सके।
हम अपने पाठकों से अपील करते हैं कि , इन बच्चों को इस दलदल से निकालने में इस मुहिम का हिस्सा बनें और यथासंभव मदद करें।

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