Wednesday, December 2, 2020

बिहार का यह किसान कर रहा है मोतियों की खेती, जिनकी तारीफ प्रधान’मंत्री भी कर चुके हैं: तरीका सीखें

26 जुलाई को प्रसारित मन की बात में प्रधान’मंत्री मोदी ने बिहार के बेगूसराय के मोती उत्पादक किसान जयशंकर सिंह का जिक्र किया। उनकी खूब तारीफ की और उनके सफलता को अनुकरणीय बताया। जय शंकर जी से हमारी मुलाकात आवाज एक पहल द्वारा आयोजित किसान सम्मान समारोह के दरम्यान हुई थी। 2018 में आयोजित इस कार्यक्रम में उन्हें हम लोगों की संस्था के द्वारा हजारों किसानों की उपस्थिति में सम्मानित किया गया था।

खेती के जीते जागते इंस्टिट्यूट और रिसर्चर हैं, जयशंकर

बेगूसराय का एक गांव है, ‘तेतरी’ और यहीं के रहनीहार हैं, जयशंकर जी।इनका परिचय इस तरह जानिए की यह खेती के जीते जागते इंस्टिट्यूट है। कमाल के रिसर्चर है। खेती को इन्होंने तपस्वी की तरह जिया है और इनकी सारी तपस्या इनके द्वारा स्थापित तालाब पर दिखता है। अमूमन आपने जितने भी तालाब देखें होंगे उससे ज्यादातर लोग मछली उत्पादन ही करते हैं। कुछ विकसित सोच वाले लोग तालाब की मेड़ों पर फलदार और इमारती पेड़ भी लगाते हैं। पर अपने जयशंकर सिंह इतने से संतुष्ट होने वाले थोड़ी ना है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन्होंने तालाब से ना सिर्फ मछली का उत्पादन करते हैं बल्कि इसके साथ ही साथ अनेकों तरह का उत्पाद प्राप्त करते हैं।

2019 की गर्मियों में जयशंकर जी के यहां जाने का मौका मिला था। आवाज एक पहल के किसान जन जागरण यात्रा की शुरुआत हो चुकी थी। 10-12 घंटे तक इनके साथ रहा। तालाब की मछली उत्पादन से बात निकल कर गोबर से मीथेन का उत्सर्जन कर गांव की हर समस्या के समाधान तक कब पहुंची, पता ही नहीं चला। बहुत कुछ देखा। उन सभी अविस्मरणीय बातों को आपसे बता रहा हूं।

तालाब, तालाब में मोती उत्पादन, मेड़ों पर अनेको प्रजाति के पेड़, बायोगैस और वर्मी कंपोस्ट के पीट सभी स्किल और इनोवेशन के हैं बेहतर उदाहरण

एक एकड़ के तालाब में ये मोती उत्पादन के साथ-साथ मेड़ों पर अनेको प्रजाति के पेड़ लगा रखे हैं। सबसे खास बात तो यह है कि इनके मीठे पानी वाले तालाब में मोती उत्पादन भी काफी सफलतापूर्वक हो रहा है। मोती उत्पादन बहुत आसान काम नहीं है, जी तोड़ परिश्रम के साथ बेहतर स्किल और इनोवेशन के कारण ही यह उनके तालाब में संभव हो पाया है। मेड़ों पर ही इन्होंने बायोगैस और वर्मी कंपोस्ट का पीट भी बना रखा है। सबसे खास बात यह है कि यह तालाब पूरी तरह से प्राकृतिक है। आपको हैरानगी होगी कि जय शंकर जी कभी भी मछलियों को खाना प्रदान नहीं करते। वे तालाब में उपलब्ध विभिन्न तरह के खाद्य पदार्थ से ही अपना गुजारा कर लेती हैं।

Jayshankar singh pearl farming

इनके तालाब में मछलियां भी पाली जाती हैं जो जल्द ही विश्व की सबसे लंबी मछली होने का रिकार्ड बना सकती हैं

जल्द ही जय शंकर जी आपको एक बार फिर चर्चा में दिख सकते हैं। वजह है उनके तालाब की मछलियों का लंबाई। इनके तालाब में बहुत सारी बड़ी-बड़ी मछलियां है एक मछली तो तकरीबन 5 फीट से भी लंबी है जो जल्द ही मीठे पानी में विश्व की सबसे लंबी मछली होने का रिकार्ड अपने नाम दर्ज कर सकती हैं।

अपनी सूझ बूझ की वजह से भविष्य में खेती का कोई रोल मॉडल हुआ तो वो होंगे, जयशंकर

भविष्य में खेती का अगर कोई मॉडल होगा तो वह मॉडल जय शंकर जी ने समाज को दिखा दिया है। इस जगह की हर एक चीज हर दूसरे चीज के लिए लाभकारी है। फायदेमंद है। प्रकृति के साथ कदम ताल मिलाकर प्रगति कर रही है। छः सदस्यो का परिवार इस मॉडल को अपनाकर यानी 1 एकड़ में तालाब निर्माण कर अपने परिवार का गुजारा आसानी से कर सकता है। जय शंकर जी ने तालाब के मेड़ों का जितना बेहतर इस्तेमाल किया है उतना शायद ही किसी ने किया होगा। लगभग 10 कट्ठे की एरिया में 450 के आसपास पेड़ लगाया हुआ है। इन्हीं मेड़ो पर उन्होंने वर्मी कंपोस्ट और बायोगैस का प्लांट भी लगा रखा है जो थोड़ी बहुत जगह बच जाती है वहां पर वो सब्जी उत्पादन कर लेते हैं। जयशंकर जी बहुत विजनरी किसान है। इनके पास गांव-गरीब की हर समस्या का समाधान है । जरूरत है समाज-सरकार ऐसी काबिलियत को निखारें और इनके मॉडल को जन-जन तक फैलाये।

कैसे बनता है मोती।

मोती बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत सीप से होती है। वही सीप जो आपको नदी झरने और तालाबों के किनारे आसानी से दिख जाते हैं। ज्यादातर किसान इन्हीं जगहों से इकट्ठा करके सीप को अपने तालाब में डालते हैं। हालांकि बहुत सारे जगह पर बिकता भी पालन किया जा रहा है जहां से मोती उत्पादक किसान खरीद के ले जाते हैं। मोती उत्पादन में इस बात का विशेष ख्याल रखा जाता है कि तालाब का क्षेत्रफल एक एकड़ के आसपास हो। कम क्षेत्र में मोती उत्पादन संभव नहीं है । सीप से मोती तैयार करने के विशेष ट्रेनिंग की भी जरूरत होती है।

यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें उचित सूझबूझ के साथ अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है। सबसे पहले सीप का ऑपरेशन किया जाता है जिसमें कोई फॉरेन बॉडी डाली जाती है। फॉरेन बॉडी से हमारा तात्पर्य कुछ ऐसे पदार्थ से हैं जोकि बाहर से सीप के बॉडी में डाले जाते हैं। फॉरेन बॉडी डालने के बाद कैल्शियम कार्बोनेट की परत बनायी जाती है।जिस आकार की फॅारेन बॉडी सीप में डाली जाती है, उसी आकार का मोती तैयार होता है। सीप की उम्र 3 साल होने पर उसमें मोती तैयार किया जा सकता है। सीप की अधिकतम उम्र 6 साल होती है। सबसे महंगा मोती ब्लैक पर्ल होता है, जो समुद्र की सीप से बनता है।

मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम शरद ऋतु यानी अक्टूबर से दिसंबर तक का समय माना जाता है।
बाजार में एक सीप लगभग 100 से 200 रुपए की आती है। सामान्यत: सीप 3 वर्ष की उम्र के बाद मोती बनाने के काम में ली जाती है। मोती तैयार होने में लगभग 14 माह का समय लगता है। इस दौरान सीप के रख-रखाव पर किया जाने वाला खर्च इसकी लागत में शामिल होता है।

The Logically के लिए इस कहानी को लवकुश ने लिखा है। बिहार के रहने वाले लवकुश कृषि क्षेत्र में काम करते हैं और अनेकों तरीके से किसानों की मदद कर सकते हैं ।

मोती की खेती के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप इनसे सम्पर्क कर सकते हैं।

आवाजएकपहल लवकुश

News Desk
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