Sunday, October 24, 2021

गरीबी के दलदल से बाहर आने के लिए करनी पड़ी कड़ी मेहनत, प्लेटफॉर्म पर रात गुजार कर बने IAS अफसर

गरीबी हमारे समाज के लिए एक ऐसा अभिशाप है जो सदियों से चला आ रहा है और पता नहीं आगे भी कब तक चलता जाएगा। गरीबी से बेहाल जीवन को चलाने के लिए अक्सर लोग मजदूरी किया करते हैं। दिन भर बोझ उठाना, खेतों में काम करना और पूरे दिन शारीरिक मेहनत करके रोजी रोटी कमाना मजदूरों का जीवन सिर्फ इसी में सिमट के रह जाता है। लेकिन जो बड़ी सोच रखते हैं, जो बड़ा सपना देखते हैं, मेहनत और लगन से सपने को साकार करने की कोशिश करते हैं, बड़ी कामयाबी भी उन्हीं के हाथ लगती है।
यह कहानी है तमिलनाडु के रहने वाले एक ऐसे मजदूर की जिसने अपनी मेहनत और लगन से आईएएस ऑफिसर की कुर्सी हासिल की। आइए जानते हैं उनके बारे में।

IAS एम शिवागुरु प्रभाकरण

एम शिवागुरु प्रभाकरण तमिलनाडु के रहने वाले हैं। बचपन से ही सुख सुविधाओं के नाम पर उन्हें कुछ ना मिला। आर्थिक तंगी के कारण ना ही पढ़ाई के लिए पैसा, ना रहने के लिए घर और बाकी सुविधाएं तो दूर की बात है। सर छुपाने के लिए प्लेटफार्म एक मात्र सहारा था। भले ही सुबह-शाम भोजन हो ना हो, बदन ढकने को ढंग के कपड़े हो ना हो, प्रभाकरण ने अपने मन में एक ही सपना सजाया। सपना था आईएएस ऑफिसर बनना। गरीबी में जन्मे प्रभाकरण के साथ जन्म से ही कुछ परेशानियां थी। उनके पिता को शराब की लत थी और घर की हालत ऐसी कि सुबह शाम खाना भी मिलेगा या नहीं यह भी निश्चित नहीं था। ऐसे चुनौतीपूर्ण हालातों में बड़े सपने देखना और उन्हें साकार करना बहुत ही मुश्किल है। लेकिन मेहनत और सच्ची लगन से किया गया हर काम सफल ही होता है। प्रभाकरण ने अनगिनत परेशानियों का सामना किया। घरवाले पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते थे इसलिए उन्हें मजदूरी भी करनी पड़ी। कई बार असफल होने के बाद भी आखिरकार उन्होंने आईएएस ऑफिसर बन कर ही दम लिया।


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कैसे हुई पढ़ाई

अपने सपनों को साकार करने के राह में प्रभाकरण के सामने कई कठिनाइयां आई। पुणे आईआईटी में एडमिशन लेना था जिसके लिए उन्हें चेन्नई में कोचिंग लेनी पड़ती लेकिन इतने पैसों का इंतजाम कर पाना भी मुश्किल था। इस मुश्किल की घड़ी में प्रभाकरण के एक दोस्त के जरिए उन्हें सैंट थॉमस माउंट के बारे में पता चला 4 जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क में पढ़ाया जाता था। प्रभाकरण ने अपना रुख चेन्नई सैंट थॉमस माउंट की तरफ किया, वहां उन्हें एडमिशन तो मिल गया लेकिन किसी से कोई जान पहचान नहीं थी। उनके पास किराए का कमरा लेने के लिए भी पैसा नहीं था इस कारण उन्हें अपना गुजारा रेलवे प्लेटफार्म पर ही करना पड़ा।
4 महीने प्लेटफार्म पर गुजारने के बाद एक छात्र ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया और प्रभाकरण को अपने साथ रहने के लिए बुला लिया। इतनी विषम परिस्थितियों का सामना करके भी प्रभाकरण के कदम नहीं डगमगाए। उनकी यह मेहनत बेकार नहीं गई और उन्हें आईआईटी में नामांकन मिल गया। प्रभाकरण ने बीटेक करने के बाद m-tech में भी टॉप किया। इसके बाद उनके सामने सिर्फ एक ही लक्ष्य था यूपीएससी की परीक्षा पास करना। उन्होंने इस परीक्षा के लिए जीत और मेहनत की लेकिन दोबारा सफल हो गए। इस असफलता के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपने हौसलों का सफर जारी रखा।


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यूपीएससी की परीक्षा

जो काम कड़ी मेहनत और सच्ची लगन के साथ किया जाता है तो सफलता हाथ जरूर लगती है। लेकिन इस सफर में असफलताएं कोई मायने नहीं रखती, असफलताओं से हार कर बैठना नहीं चाहिए। ऐसा ही प्रभाकरण के जिंदगी में भी हुआ ।दो बाररा सफल होने के बाद भी प्रभाकरण ने हार नहीं मानी और अंततः वह सफल हुए। 2017 के बैच में 990 परीक्षार्थियों के बीच प्रभाकरण ने 101 वा स्थान ग्रहण किया। जो प्रभाकरण कभी क्षेत्रों में मजदूरी किया करते थे, जिन्होंने कभी आरा मशीन पर काम किया, प्लेटफार्म को अपना आश्रय बनाया उनकी मेहनत रंग लाई और व्हो आईएस ऑफिसर बन गए।
प्रभाकरण ने जिन कठिनाइयों के बीच अपने मंजिलों का सफर तय किया और उसे हासिल किया यह वाकई काबिले तारीफ है। the logically एम शिवगुरु प्रभाकरण के जज्बे को सलाम करता है और युवा वर्ग को इन से प्रेरणा लेने की सलाह देता है।

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