गाँव वापस लौटकर प्रवासी मजदूरों ने शुरू किया जड़ी बूटी की खेती, लगभग 70 परिवार कमा रहे हैं 40 हज़ार तक महीना

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आजकल किसान परंपरागत तरीके से खेती न कर के अलग-अलग तरीके से खेती कर रहें हैं और लाखों करोड़ों रुपये की आमदनी भी कमा रहें है। किसान फसलों की खेती के अलावा जड़ी-बूटी और आयुर्वेदिक फसलों की खेती कर के भी रोजगार का नया जरिया बनाया है। वर्तमान मे ऐसे कई सारे गांव हैं जहां सुविधाओं की अपार कमी है। सुविधाओं की कमी के बावजूद भी गांव के लोग नई-नई सोंच, तरीकों और कुशलता के साथ तरक्की की राह पर आगे बढ़ रहे हैं और नई मिसाल पेश कर रहे हैं।

ऐसा ही एक गांव है उत्तराखंड (Uttarakhand) के चमोली (Chamoli) जिले के देवाल ब्लॉक का घेस गांव। इस गांव में जनसुविधाओं की बेहद कमी है। यहां के ग्रामीणों जो परम्परागत तरीके से खेती करते है, उन्होंने अब अपना पूरा ध्यान औषधीय पौधों की खेती पर केंद्रित किया है। औषधीय पौधे (Medicinal Plants) की खेती से घेस गांव के 70 परिवार घर बैठे लाखो की आमदनी कर रहे हैं। औषधीय पौधों की खेती के अनेकों फायदे भी हैं। इनका अत्यधिक उपयोग दवाइयां और ब्यूटी क्रीम बनाने में होता है। इसके अलावा परंपरागत खेती को जानवरों से हानि पहुंचती है लेकिन औषधीय पौधों को उनसे नुकसान नहीं होता है। आए दिन जडी-बूटियों की मांग बढ़ता हीं जा रहा है।

घेस गांव कुमाऊँ के अल्मोड़ा जिला के सीमा के समीप है। इस गांव में 350 परिवार है और इसकी आबादी लगभग 3,500 है। इस गांव में परम्परागत विधि से राजमा, चौलाई और फाफर का उत्पादन अधिक होता है। इससे वहां के ग्रामीण किसानों को फायदे भी अधिक होते थे। लेकिन 10 वर्ष पहले गांव के पूर्व प्रधान कैप्टन केसर सिंह ने नकदी फसलों की खेती करने के बजाय जड़ी-बूटियों की खेती करने का निश्चय किया। जड़ी-बूटियों के खेती से केसर सिंह को अच्छा-खासा मुनाफा भी हुआ। वर्तमान में जड़ी-बूटियों के उत्पादन से गांव का प्रत्येक परिवार हर सीजन में 1 लाख से अधिक की कमाई कर लेता है। वहीं परम्परागत खेती से सिर्फ 40 हजार रुपये की हीं आमदनी होती थी। परम्परागत खेती को जंगली जानवरों से बहुत हानी भी होती थी।

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केसर सिंह ने बताया कि कुटकी और अन्य जड़ी-बूटियों को खरीदने के लिये ठेकेदार गांव में ही पहुंच जाते हैं। प्रत्येक वर्ष घेस गांव में लगभग 30 क्विंटल जड़ी-बूटियों की बिक्री होती है। कुटकी की बिक्री दो से ढाई रूपये प्रति किलो के भाव से होती है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में गांव के 70 परिवार जड़ी-बूटि का उत्पादन कर रहा है। लॉकडाउन में नौकरी छूट जाने के दौरान वापस लौटे 80 प्रवासी भी अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।

दिनेश सिंह भंडारी गोवा के होटल में कई वर्षों से शेफ रह चुके हैं। कोरोना के लॉकडाउन में जब वे वापस गांव आए तो उनके पास किसी भी प्रकार का कोई रोजगार नहीं था। लेकिन जडी-बूटी के उत्पादन से जुड़कर अब वे अच्छी-खासी आमदनी कर रहे हैं। यहां तक कि उन्हें अब एडवांस में ऑर्डर भी मिलते हैं। देवेन्द्र सिंह भी गोवा में होटल व्यवसाय से जुड़े थे, गांव वापस आने पर वे भी जड़ी-बूटियों की खेती से उत्पादन करके आमदनी प्राप्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि जड़ी-बूटी को जंगली जानवरों से हानि नहीं होती है इसलिए यह घाटे का सौदा नहीं है।

घेस गांव के लोगों ने जिस तरह अपनी सोंच को बदला और ऐसा फसल उत्पादन करना शुरू किया जिसे ना तो किसी से खतरा है और आमदनी भी अच्छी होती है। The Logically घेस गांव कै लोगों के प्रयासों की खूब सराहना करता है।

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