Sunday, December 5, 2021

कभी चाय बागान में मजदूरी करती थी, अब मशरूम की खेती के अनेकों तरीके सिखाती हैं: सीखिए मशरूम की खेती

अपनी मेहनत के दम पर अपना भाग्य बदलने वाली ये महिला जिन्होंने एक दिहारी मजदूर से मशरुम के खेती के मास्टर ट्रेनर तक का सफर तय किया

अगर कड़ी मेहनत आपका हथियार है तो , सफलता आपकी गुलाम हो जाएगी

सुशीला टुड्डू , पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले में चोरा ब्लॉक के गोलामीगच की रहने वाली ये महिला जिन्होंने इस कहावत को अपने जीवन में सच करके दिखाया है । दिनाजपुर जिले के दार्जिलिंग से लगे होने के कारण यहां की भौगोलिक स्थिति चाय के खेती के लिए उपयुक्त है। ये छेत्र गरीब और पिछड़ा हुआ है जिस वजह से यहां के ज्यादातर लोग दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते है। सुशीला भी और लोगो की तरह चाय के बागानों में काम करती थी। उनके पति भी चाय के बागान में ट्रांसपोर्ट का काम करते थे। खुद की जमीन न होने की वजह से ये खेती भी नही कर सकते थे और ना ही रोजगार का कोई और साधन था। लेकिन चाय के बागान में भी सिर्फ विशेष सीजन में ही काम मिलता था और बाकी समय खाली बैठना पड़ता था जिसकी वजह से शुशीला हमेशा ही अपने भविष्य को लेके चिंता में रहती थी। अपने दो बच्चों को देख के उनके मन मे ये खयाल आता था कि वो अपने और उनके बेहतर भविष्य के लिए और क्या कर सकती है?

डॉक्टर अंजलि की सुशीला के जीवन मे एंट्री

डॉ अंजलि शर्मा जो कि उत्तर दिनाजपुर कृषी विज्ञान केंद्र में कार्यरत है। यह केंद्र सुशीला के घर से ज्यादा दूर नही है। डॉ अंजलि ने दिनाजपुर जिले में एक कार्यक्रम के दौरान ये पाया कि चाय के बागानों में काम करने वाली महिलाएं काम मे इतना व्यस्त रहती है कि वो अपने बच्चों के खान पान का ध्यान रख सके।

डॉ अंजलि इस वजह से चिंता में रहती थी और सोचति थी कि इन महिलाओं के पास बागों में मजदूरी करने से हटकर कुछ अलग काम होना चाहिए जिससे वो अपने घर के नजदीक में ही रहे और बच्चो की भी देखभाल कर सके। एक तरफ सुशील भी चिंतित हो रही थी अर इधर डॉ अंजलि भी महिलाओं के प्रति कुछ करने की प्रयास में जुटी थी।

जब इंसान कुछ करने के लिए पूरे लगन से लग जाता है तो सफलता उसे जरूर मिलती है, ऐसा ही कुछ हुआ डॉ अंजलि के जीवन मे जब कृषि विज्ञान केंद्र में मशरूम कल्टीवेशन का काम शुरू हुआ। डॉ अंजलि और उनके साथियों ने निश्चय कर लिया कि इन मजदूर महिलाओ को मजदूरी से निकाल कर मशरूम उत्पादन के काम मे लगाया जाए। जब सुशील को इश्तेहार के माध्यम से ईश प्रशिक्षण के बारे में पता चला तो उन्होंने बड़ी ही गंभीरता से इसमे सामिल होने का मन बना लिया।

सुशीला ने प्रशिक्षण में भाग लिया और बड़ी पूरे प्रशिक्षण में वह दूसरों से एक कदम आगे थी। डॉ अंजलि सुशीला के बारे में बताया कि वे पूरे प्रशिक्षण को बड़ी ही गम्भीरता से लेती है और हमेशा ही नई नई चीजें सीखने को तैयार रहती है। जो भी काम करती है पूरे मन से करती है।

डॉ अंजलि बताती है कि सुशीला बाकी लोगो की तरह नही थी वे प्रशिक्षण में बताई गई बातों को अमल में लाती थी और उसके अनुसार ही काम करती थी। सुशील ने प्रशिक्षण के बाद भी काम को पूरी गम्भीरता से किया और कभी हम पे आश्रित नही रही। एक बार उन्हें बता देने पे वह सारा काम स्वयं ही कर लेती थी। उन्हें एक बार बताना होता था कि कौन सी चीज कहा मिलेगी तो वे खुद ही उस चीज़ को लेने जाती थी। एक आदिवासी महिला होते हुए भी गोलामीगच से सिल्लीगुड़ी जाके सारा सामान खरीदती थी और कभी किसी चीज़ की मांग या शिकायत नही करती थी।

मशरुम की खेती से बदला जीवन

डॉ अंजलि के अनुसार सुशीला की समझदारी और कार्य सम्पनता को देखकर ही उन्होंने भारत सरकार द्वारा संचालित ट्राइबल सब प्लान के तहत उन्ही के घर घर पे मशरूम की एक यूनिट लगा कर दी। जिसमे सुशिला ने मेहनत और लगन से काफी अच्छा काम किया !उनकी कार्य कुशलता के कारण उन्हें फायदा होता गया और उनकी खेती की समझ और ज्यादा पुख्ता हो गयी। उन्होंने अपनी सूझ बूझ से मशरुम की एक और यूनिट लगा ली और लगातार उत्पादन करने लगी। जबतक उनके एक यूनिट के मशरूम बिकते थे तब तक दूसरी यूनिट डिक्री के लिए तैयार हो जाते थे। उत्पादन से लेके बिक्री तक का काम वे खुद ही दिनाजपुर और सिल्लीगुड़ी के हाट बाजार में जाके करने लगी। उनके मशरुम जल्दी ही बिकते थे क्योंकि सुशील ने गुणवत्ता से कोई समझौता नही किया था। जिस वजह से उसके मशरूम जल्दी ही बहुत मशहूर हो गए ।

मशरुम के खेती की समझ और उनकी लगाम को देखते हुए आगे चलकर उन्हें मूल्य संवर्धन कार्य मे शामिल किया गया जहाँ मशरुम स्पेंट से वर्मी कम्पोस्ट खाद, मशरुम पाउडर , मशरुम चंक , बड़ी , पापड़ बनाया जाता है। सुशीला मशरुम के साथ साथ इनसब चीज़ों की भी बिक्री करने लगी।

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Photo-ThebetterIndia

द बेटर इंडिया ने जब 31 वर्षीया सुशील से ईश बारे में बात की टैब उन्होंने संताली भाषा मे “आदिमोछ ” कहा जिसका मतलब है अच्छा। उन्होंने बताया कि उन्हें हिंदी की ज्यादा जानकारी नही है। उन्होंने टीवी देखकर ही थोड़ी बहुत हिंदी सीखी है। उन्हें संवाद करने में दिकत्ते आती है लेकिन सच्ची भावनाये किसी भाषा की मोहताज नही होती है। अब सुशील की बातों से ये जान पड़ता है कि वे पहले की मुकाबले अब आत्मनिर्भर है । उनकी बातो में आत्मविश्वास और संतोष नजर आता है। जब वे मजदूर थी तब लगातार काम करने के बाद भी उनके हाथ जड़ कुछ नही आता था और एक अनिश्चितता लगी रहती थी लेकिन मशरूम हर मौसम उगता है जिससे उन्हें अपनी मर्जी से काम करना पड़ता है। एक बार की बिक्री में 20 से 25 किलो की होती है जिससे उनका गुजरा आराम से हो जाता है।

एक प्रशिक्ष के रूप में है सुनीता

आज FIG (Farmer Interest Group) की सदस्या है,साथ ही एक सेल्फ हेल्प ग्रुप मशरुम फार्मर ग्रुप की अध्यक्ष और साथ ही साथ उत्तर दिनाजपुर कृषि विज्ञान केंद्र में मास्टर ट्रेनर के रूप में ट्रेनिंग भी दे रही है। चाय के बागानों में काम करने वाली एक आदिवासी महिला जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से कृषि विज्ञान केंद्र की मदद लेकर काम सुरु किया और उसी केंद्र में मास्टर ट्रेनर के रूप में उभरी ये वाकई प्रशंशनीय है।

भारत सरकार द्वारा गौरव की प्राप्ति

सुशीला ने वर्ष 2014 में कृषि विज्ञान केंद्र के तकनीकी मार्गदर्शन में मशरूम उत्पादन और संवर्धन का काम शुरू किया था । दिनाजपुर कृषि विज्ञान केंद्र ने उन्हें वर्ष 2018 में महिंद्रा समृद्ध कृषि युवा सम्मान के लिए नामांकित किया और 7 मार्च 2018 को सुशीला टुड्डू को भारत सरकार के तत्कालीन कृषि एवं किशन कल्याण मंत्री , श्री राधामोहन सिंह के हाथों मोनेमटो, सर्टिफिकेट एवं 2•11 लाख की प्रोत्साहन राशि प्रदान किया गया। यह सम्मान के बाद सुशील काफी चर्चित हो गयी। इसके बाद काफी सारे लोग उनसे कृषि विज्ञान की प्रशिक्षण लेके आने लगे । सुशील का गोलामीगच का मिट्टी का मकान अब पक्के का हो चुका है। जो कि उसके इलाके का पहला पक्का मकान है।

हमारा देश आज इतनी प्रगति कर चुका है फिर व कुछ ऐसे आदिवासी छेत्र है जो आज व ईश प्रगति से काफी पिछड़ा हुआ है ऐसे में सुशील टुड्डू जैसी महिला का ईश तरह से आगे बढ़ कर आना उन सब के लिए एक उम्मीद की एक नई सुबह लेके आया है जिसका सूरज डॉ एंजलो शर्मा है। इनकी भूमिका और मेहनत वाकई अद्भुत है और इसके लिए वे बधाई की पात्र है।