Monday, November 30, 2020

पिता के कैंसर से जैविक खेती की तरफ़ रुख किये, 18 एकड़ के जमीन से 27 लाख का फ़सल बेच रहे हैं

आधुनिक समय में खेती करने के भी तरीके काफी आधुनिक हो चुके हैं। जिनमें से एक खेती में रसायन और हानिकारक कीटनाशक का इस्तेमाल है। इसके कारण इंसानों को बहुत सी जानलेवा बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है, उन्ही में से एक घातक बीमारी है कैंसर। आज आपको एक ऐसे किसान की कहानी सुनाते है जिन्होंने इन्ही रासायनिक पदार्थो का इस्तेमाल के कारण अपने पिता को खो दिया और इससे सबक लेकर प्राकृतिक खेती करनी शुरू की।

खेतो में रसायन का इस्तेमाल करना क्यों छोड़ा

गुजरात के सूरत के ओलपड के रहने वाले एक किसान है रामचंद्र पटेल (Ramchandra Patel)। रामचंद्र पटेल एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इन्होंने बीकॉम तक की पढ़ाई की है और उसके बाद खेती से जुड़ गए। इनकी जिंदगी में एक बड़ा बदलाव तब आया जब इन्हें पता चला कि इनके पिता को जानलेवा बीमारी कैंसर है। इनके पिता धूम्रपान और शराब के सेवन से दूर ही रहते थे फिर भी उन्हें कैंसर हो गया यह बात रामचंद्र पटेल के लिए ताज्जुब की थी। मुंबई के अस्पताल में 13 से भी अधिक बार दौड़ने के बाद डॉक्टरों से मिलने पर पता चला कि फसलों में रसायन और हानिकारक कीटनाशक के छिड़काव के कारण इनके पिता को कैंसर हुआ है। कुछ समय बाद इनके पिता की मृत्यु हो गई और इसके बाद पटेल ने रासायनिक खेती करनी छोड़ दी।

banana farming

बंजर ज़मीन को उपजाऊ बना दिया

1991 में इन्होंने एक गैर कृषि भूमि के प्लॉट पर जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग(ZBNF) अपनाते हुए उस जमीन को उपजाऊ बना दिया। रामचंद्र पटेल बताते हैं कि इस बंजर और सस्ती जमीन को खरीदने के लिए उन्हें सब लोगों ने मना किया था। सब ने कहा था कि यह सिर्फ पैसे की बर्बादी है और इस पर कुछ होने वाला नहीं है। पर रामचंद्र पटेल ने अपने दृढ़ निश्चय और कड़ी मेहनत से उन सब को गलत साबित कर दिया। उन्होंने इस बंजर जमीन को प्राकृतिक रूप से खेती के लिए तैयार किया और इसे उपजाऊ भूमि में तब्दील कर दिया। रामचंद्र पटेल(Ramchandra Patel) बताते हैं कि वह इस में सबसे ज्यादा ध्यान जमीन को उपजाऊ बनाने पर देते हैं। अगर जमीन स्वस्थ होगी तो वह उपजाऊ होगी। इससे उत्पादन भी बेहतर होगा और उत्पादन बेहतर होगा तो मुनाफा भी आएगा। वह बताते हैं कि उनकी खेती में इनपुट लागत शून्य है। मिट्टी उपजाऊ होने के कारण उत्पादन ज्यादा होता है जिससे उन्हें मुनाफा अधिक होता है।

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प्राकृतिक तरीके से कैसे खेती की

रामचंद्र कहते हैं कि जंगल का कोई रखरखाव नहीं करता फिर भी वहां पर पेड़ पौधे बहुत होते हैं और काफी हरियाली होती है। इसी बात को ध्यान में रखकर उन्होंने अपनी खेती प्राकृतिक रूप से करने की सोची और प्राकृतिक रूप से ही उस खेत को खेती लायक बनाने का विचार किया। वह बताते की भूमि को उपजाऊ बनाने की केचुओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं।

रामचंद्र पटेल ने अपनी भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए बायोमास को रिसाइकल करके खेत को हरी खाद से ढक दिया। उसके बाद उन्होंने मिट्टी में जीवामृत जो कि गोबर, गोमूत्र, पानी और गुड़ के मिश्रण से बनता है उसे मिट्टी में मिला। यह मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है और बैक्टीरियल एक्टिविटी को भी बढ़ाता है।इससे फंगल इन्फेक्शन की समस्या दूर होती हैं। रामचंद्र बताते हैं कि उन्होंने रसायन और हानिकारक कीटनाशक के छिड़काव की जगह जीवामृत और मल्चिंग बनाने की प्रक्रिया पर अधिक ध्यान दिया। मल्चिंग के लिए वह मिट्टी को प्लास्टिक के चादर की जगह सूखे पत्तों से ढंकते हैं। इसी कारण उन्हें सफलता प्राप्त हुई। इस प्रक्रिया से मिट्टी उपजाऊ बनती है। तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद इन्हें सफलता प्राप्त हुई और भूमि उत्पादन के लिए तैयार हो गई।

BANANA FARMING

बीज बोने के लिए रामचंद्र इंटरक्रॉपिंग विधि का इस्तेमाल करते हैं। इसके तहत एक ही भूमि पर दो या उससे अधिक पौधों को रोपा जाता है। इसमें ऐसे पौधे चुनते हैं जो एक दूसरे के पूरक हो जैसे उन्होंने अपने खेत मे केले और हल्दी की खेती की। पटेल अपनी फसल को रोगों से बचाने के लिए नीम और गोमूत्र का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा पानी के छिड़काव के लिए ड्रिप इरिगेशन मेथड का इस्तेमाल करते हैं। जिससे 50% पानी की बचत होती है।

प्राकृतिक खेती के फायदे

रामचंद्र पटेल कहते हैं कि प्राकृतिक तरीके से खेती करने की अनेक फायदे हैं। रसायनिक छिड़काव बंद करने पर उनकी स्किन एलर्जी कम हो गई। यह हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। हमें कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों से दूर रखता है। रामचन्द्र पटेल ने अपने खेत मे केला, हल्दी, गन्ना, पर्पल पम, चावल के अनेक किस्मे, अमरूद, बाजरा, लीची आदि लगाई हैं। वह बताते है कि उन्हें एक एकड़ जमीन पर डेढ़ लाख और 18 एकड़ जमीन पड़ 27लाख रुपये मुनाफा होता हैं।

वैल्यू एडेड प्रोडक्ट बनाते हैं

खेती के अलावा रामचंद्र पटेल वैल्यू ऐडेड प्रोडक्ट भी बनाते हैं जैसे कि केले के चिप्स, गन्ने का रस, हल्दी पाउडर, टमाटर की प्यूरी आदि। वह इनसब प्रोडक्ट्स को अपने खेत के आगे बने आउटलेट में ही बेचते हैं।

मृणालिनी सिंह
मृणालिनी बिहार के छपरा की रहने वाली हैं। अपने पढाई के साथ-साथ मृणालिनी समाजिक मुद्दों से सरोकार रखती हैं और उनके बारे में अनेकों माध्यम से अपने विचार रखने की कोशिश करती हैं। अपने लेखनी के माध्यम से यह युवा लेखिका, समाजिक परिवेश में सकारात्मक भाव लाने की कोशिश करती हैं।

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