Monday, January 30, 2023

बैंगन की नई प्रजाति हुई विकसित, कीटों से नहीं होगा नुकसान, होगी बंपर पैदावार

किसान अपनी पूरी मेहनत एवं तरकीब लगाकर फल व सब्जियों की बुआई करते लेकिन वे तब निराश हो जाते हैं जब उनके फसल कीड़ों के कारण नष्ट हो जाते हैं। अधिकतर मामलों में लाख कोशिश करने के बावजूद भी सब्जियों जैसे बैंगन या टमाटर आदि में कीड़े लग ही जाते हैं। इसलिए इन सारी बातों को मद्देनज़र वैज्ञानिकों द्वारा फसलों की ऐसी किस्म विकसित हुई है जिनमे कीड़े नहीं लगेंगे। हालांकि ये किस्में सभी फसलो के लिए नहीं है बल्कि बैंगन के लिए है।

वैज्ञानिकों द्वारा विकसित हुई बैंगन की नई प्रजाति

हमारे देश के वैज्ञानिक हमेशा कुछ-ना-कुछ पद्धति विकसित करते रहते हैं जिससे सब्जियों या फलों के उत्पादन में कम लागत, कम पानी तथा अधिक उत्पादन हो। उन्हीं की बदौलत किसानों को खेती में लाभ मिलता। वैज्ञानिकों द्वारा बैगन की ऐसी प्रजाति को तैयार किया गया है जो किसानों के लाभ को कई गुना बढ़ाएगा। बैंगन की यह प्रजाति हमारे किसानों के लिए काफी लाभदायक सिद्ध होगी।

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होगा बेस्ट क्वालिटी का सब्जी उत्पादन

जानकारी के मुताबिक बेजो शीतल सीड्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा ये विकसित हुआ है। कंपनी के पदाधिकारियों द्वारा यह दावा किया गया है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में ट्रांसजेनिक पद्धति को विकसित किया है। इसी ट्रांसजेनिक पद्धति की सहायता से बैंगन की एक ऐसी प्रजाति विकसित की गई है जो किसानों के लिए लाभदायक होगी। यह नई किस्म की जनक तथा बीएसएस -793 है। इस प्रजाति में एफ़स1 जीन, क्राय1, बीटी जीन का उपयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त यह आईएआरआई द्वारा पेटेंट भी हुआ है। किसान अगर इस तकनीक का उपयोग करते हैं तो उन्हें बेहतर क्वालिटी की सब्जी मिलेगी।

नहीं होगा बीज नष्ट

कम्पनी के अधिकारियों ने यह बताया कि बेजो शीतल ने वर्ष 2005 में लाइसेंस लिया था। इसके प्रशिक्षण हेतु यूनिवर्सिटी आफ हॉर्टिकल्चरल साइंसेज, बगलकोट कर्नाटक से रिक्वेस्ट भी किया। विशेषता यहां कीटों के खिलाफ प्रतिरोध को विकसित करने के लिए कार्य किया गया है। हम आपको यह बता दें कि इन प्रजातियों द्वारा हमारे फल तथा सब्जियों को बेहद का लाभ होगा। अगर आप 100 फीसदी फल लेते हैं तो इसमें मात्र 3 फ़ीसदी नुकसान के चांस हैं बाकी सब सफल रहेंगे।

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वैज्ञानिकों द्वारा होगा निरीक्षण

अब कंपनी हाइब्रिड बैगन की किस्मों के परीक्षण हेतु रिक्वेस्ट करने में लगी है। इसके लिए वह जैव प्रौद्योगिकी नियामक जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति से कांटेक्ट करेगी। बस यहां अगर गाइडलाइन मिलेगी तो फिर 1 हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसल के दौरान विश्वविद्यालय के लेवल पर वैज्ञानिकों द्वारा फसल उगा या जाएगा। हालांकि यहां चीज़ वैज्ञानिकों के देख रेख में होगा।