Saturday, July 31, 2021

बचपन मे ही पिता का निधन हो गया, तमाम मुश्किलों से लड़कर आज SDM बन चुकी हैं और अनेकों तरीकों से लोगों की मदद करती हैं

अगर हमारे अंदर हौसला के साथ दृढ़संकल्प है तो सफलता किसी भी परिस्थिति का सामना कर अपनी मंजिल प्राप्त कर सकता है। किसी ने कहा है कि जिंदगी का मतलब ही संघर्ष है। अगर संघर्ष नहीं तो जिंदगी को जीने का मजा नहीं मिलता। लेकिन इन सभी बातों को वही समझ सकता है जो जिंदगी से जंग लड़ कर उसमें जीत हासिल किया हो। आज की यह कहानी एक ऐसी लड़की की है जिसके पिता का निधन उसके बचपन में ही हो गया फिर भी कठिन संघर्षों को पारकर उसने सफलता हासिल कर आज वह सभी के लिए खुद को आदर्श बना दिया है।

रीना छिंपा

रीना छिंपा (Rina Chhimpa) ने अपनी जिंदगी में आए सभी बाधाओं को पार करते हुए अपनी ख्वाहिशों को पूरा किया है। यह अपने प्रदेशों में सरकारी कामकाज एवं नियमों को पारित करने में अपनी महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। सरदार शहर में रीना अपने उपखंड ऑफिसर के पद पर तैनात हैं। वह वहां के वासियों को कोरोना से लड़ने के लिए मदद कर रही हैं। जो व्यक्ति वहां के नियमों को नही मानता है उसके साथ वह पहले तो नम्रतापूर्वक समझाती हैं लेकिन ना मानने पर वह सख्त व्यवहार भी करती हैं।

SDM Reena chimpa

बनी बुलन्दशहर की रक्षक

1 अप्रैल को जब वहां सात व्यक्ति कोरोना से संक्रमित पाए गए तब सिर्फ वहां नहीं बल्कि बीकानेर संभाग (Bikaner Sanbhag) के सभी जगहों में भगदड़ मच गई। वह जो कोरोना से संक्रमित से व्यक्ति थे वह दिल्ली (Delhi) में हुए जमात से वापस आए हुए थे। उसके बाद वहां प्रशासन के आदेश अनुसार कर्फ्यू लागू कर दिया गया। उस दौरान वहां की SDM रीना ने अपने धैर्य और साहस को दिखाते हुए वहां के लोगों को विश्वास के साथ हर वह जरूरतमंद सामग्रियां पहुंचाईं जो उन्हें चाहिए थीं। वह अपने 2 वर्षीय बेटे को छोड़कर पूरे सरदारशहर की रक्षा करने में लग गईं। उन्होंने सिर्फ लोगों को राशन ही नहीं पहुंचाया बल्कि जो प्रवासी मजदूर थे उन्हें उनके घर भी पहुंचाया।

भामाशाह हुए प्रेरित

इस कोरोना महामारी से गरीब और असहाय व्यक्ति अपनी जिंदगी में ज्यादा तकलीफों का सामना ना करें और वह खाली पेट ना सोए इसके लिए उन्होंने भामाशाहों को भी प्रेरित किया। उनकी वजह से भामाशाहों ने उन जरूरतमंदों की मदद की। आज चूरू जिले में जितने भी दान हुए हैं वह सब भामाशाह ने ही किया है। देखा जाए तो ज्यादातर दान उन्हीं का है। भामाशाह ने जितना भी दान दिया उसकी वजह से सरदारशहर में कोरोना के वक्त का समय आसानी से व्यतीत हुआ।

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RAS बनने का सफर नहीं रहा आसान

रीना जब मात्र 10 वर्ष की थीं तब उनके पिता का साया उनके सर से उठ गया। उस वक्त वह छठी वर्ग में थीं। उनके पिता का नाम जगदीश प्रसाद छिंपा था जो एक किसान थे। फिर भी उन्होंने अपनी हिम्मत को परास्त नहीं होने दिया और आरएएस बनकर सपने को पूरा किया। उन्होंने अपनी पूरी पढ़ाई सरकारी स्कूल और कॉलेज से ही कंप्लीट की है। सबसे खास बात तो यह है कि रीना कभी भी किसी कोचिंग क्लास में किसी भी पढ़ाई के लिए नहीं गई हैं। उन्होंने अपने आरएएस की तैयारी भी अपने घर से ही करके उसमें सफलता हासिल की हैं। जब वह बीएड की पढ़ाई कर रही थीं तो वह उस दौरान विश्विद्यालय में टॉपर थीं। उन्हें राष्ट्रपति और राज्यपाल ने सम्मानित भी किया है। वैसे RAS (Rajasthan Administrative Service) बनने से पूर्व वह 4 गवर्मेंट जॉब भी कर चुकी हैं लेकिन उन्होंने उसे त्याग दिया क्योंकि वह सिर्फ RAS बनना चाहती थीं।

अपनी मेहनत के दम पर सफलता को पाने और लोगों की मदद करने के लिए The Logically रीना छिंपा जी को सलाम करता है।