Thursday, January 28, 2021

पुलवामा शहीदों के नाम पर उगाये वन, 40 शहीदों के नाम पर 40 हज़ार पेड़ लगा चुके हैं

अक्सर हम सभी पेड़ से पक्षियों के घोंसले को गिरते तथा अंडे को टूटते हुए देखा है। यदि हम बात करें पक्षियों की संख्या के बारे में तो दिन-प्रतिदिन घट रही है, क्योंकि मनुष्य पर्यावरण का हनन कर रहा है। बहुत अधिक संख्या में पेड़-पौधों को काटा जा रहा है, जिससे जंगल में रहने वाले पशु-पक्षी विलुप्त हो रहे हैं। गायब हो रहे पशु-पक्षियों की घटती संख्या के बारे में यदि कोई हमसे पूछता है तो हम सभी यही कह देते हैं कि इसमें हम क्या कर सकते हैं। जबकि मनुष्य को हीं एक अहम कदम उठाना होगा।

ऐसे में हम जंगल के जीवों को विलुप्त होने से बचाने के लिए हम अधिक संख्या में पेड़ पौधे लगा सकते हैं तथा उनके जीवन की रक्षा कर सकते है। इससे मनुष्य जाति को भी फायदा पहुंचेगा, क्योंकि प्रकृति हीं जीवन का आधार है। बिना प्रकृति के जीवन संभव ही नहीं है।

आज की कहानी भी दो ऐसे व्यवसायियों की है जिन्होंने चिड़ियों के टूटे घोंसले और अंडे को देखकर जंगल लगाने का फैसला किया। अभी तक दोनो ने 55 जंगल लगाए हैं। आइए जानते हैं उन दोनों व्यवसायियों के बारे में जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण और जंगलों के जीवों की संरक्षण में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

forest on the name of martyrs

राधाकृष्णन नायर और दीपेन जैन दोनों पर्यावरणविद् है। इन दोनों की दोस्ती 10 वर्ष पुरानी है। यह दोनों मित्र पिछले 6 वर्षों से एक साथ काम कर रहे हैं और इनका कार्य जंगल उगाना है। यह दोनों दोस्त मियावाकी तकनीकी की सहायता से जंगल उगा रहे हैं। मियावाकी तकनीक की सहायता से कम वक्त में हीं घने जंगल का विकास किया जा सकता है। राधाकृष्णन नायर और दीपेन जैन ने अभी तक लाखों पौधे लगा चुके हैं तथा वे सभी पौधे वृक्ष भी बन गए हैं।

नायर मूल रूप से केरल के रहनेवाले हैं। लेकिन आरंभ से हीं उनका परिवार कर्नाटक आ गया। उसके बाद नायर नौकरी की तलाश में मुम्बई गये उसके बाद गुजरात के उमरगांव आ गये। वहां उन्होंने खुद का कपड़ा का व्यवसाय शुरु किया। वहीं दीपेन जैन मुंबई में हीं पले-बढ़े हैं तथा वह एक व्यवसायी परिवार से ताल्लुल रखते हैं। इन दोनों की भेंट व्यवसाय के कारण हुई।

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नायर हमेशा से हीं सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए हैं। वह बताते हैं कि कई वर्ष पहले मरगांव के सड़को को चौड़ा करने के लिए सैकड़ों की संख्या मे पेड़ों की कटाई हुई। उन्होंने पेड़ों की कटाई रोकने की काफी कोशिश की परंतु कुछ नहीं हुआ। एक दिन वे अपनी गाड़ी से गुजर रहे थे उसी समय उन्होंने देखा कि एक चिड़िया सड़क के किनारे घूम रही थी और वह आवाज दे रही है। चिड़िया की आवाज पर उन्होंने गौर किया तो जानकारी मिली कि नीचे उसका अण्डा टूट गया है। नायर ने बताया कि वह चिड़िया बार-बार उपर के पेड़ों पर जाती फिर वापस टूटे अंडे के पास आती। उसे देखकर नायर को अनुभव हुआ कि जैसे वह हम सबसे मदद की गुहार लगा रही है। वह हमसे पूछ रही है कि हमने क्या बिगाडा था? उस घटना ने नायर को बेहद प्रभावित किया।

forest on the name of martyrs

नायर इस बारे में विचार करते रह गए वह क्या कर सकते हैं। उसके बाद इस बारे में उनकी बातचीत उनके मित्र दीपेंद्र जैन से हुई। दीपेन बताते हैं कि जब इस बारे में नायर ने उन्हें बताया तो उन्हें भी अनुभव हुआ कि सच में हम सब को कुछ करना चाहिए। दीपेन जैन बताते हैं कि बिजनेस के सिलसिले में उन्हें कई बार जापान जाना पड़ता है। वहां के कई लोग इनके क्लाइंट हैं। वही दीपेन जैन को मियावाकी तकनीक के बारे में जानकारी हासिल हुई। मियावाकी कम जगह में भिन्न-भिन्न किस्मों के पेड़-पौधे लगाने की तकनीक है। उसे उन्होंने सघन वन नाम दिया है।

नायर और दीपेन ने मियावाकी संस्थान से संपर्क करके इस तकनीक को सीखा। नायर का परिवार इसी कार्य से जुड़ा हुआ था। इसलिए उनका बचपन पेड़-पौधों के बीच में गुजरा है। पेड़-पौधों के बीच में बचपन गुजारने की वजह से उनको इस तकनीक को समझने और करने में अधिक कठिनाई नहीं हुई। दोनों दोस्तों ने गुजरात के गांव में एक छोटी सी जमीन खरीदी तथा वहां पर सबसे पहले एक मियावाकी जंगल बसाया। सिर्फ ढाई वर्षों में ही इसकी अच्छी से देखभाल करने की वजह से यह जंगल अच्छी तरह से पनप गया। मियावाकी जंगल की सफलता ने पूरे क्षेत्र में पहचान दिला दी।

दीपेन ने बताया कि नायर जी को सामाजिक कार्य से जुड़े होने की वजह से क्षेत्र के स्कूल-कॉलेज उन्हें पहचानते हैं। उन्हें जंगल के बारे में जानकारी मिलने पर उन्हें स्कूल-कॉलेजों में भी पेड़-पौधे लगाने का अवसर प्राप्त हुआ। उसके बाद धीरे-धीरे ऐसी हीं इंडस्ट्री से भी ऑफर आने लगे उसके बाद उन्होंने एनवायरो क्रिएटर फाउंडेशन बनाया। इसके तहत उन्होंने ‘फॉरेस्ट क्रिएटर्स’ की शुरुआत की।

forest on the name of martyrs

फॉरेस्ट क्रिएटर्स’ की टीम ने 12 राज्यों में 55 मियावाकी जंगल तैयार कर चुकी है। इनमें से कई जंगल छोटी जगह में है तो कई जंगल बहुत बड़ी जगह में है। उन्होंने सभी प्रोजेक्ट को अलग-अलग लोगों के साथ मिलकर किया है। कोई इंडस्ट्रियल कंपनी के लिए है, वही बहुत सारे प्रोजेक्ट उन्होंने बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीएसआर की सहायता से किए हैं।

हाल ही में उन्होंने उमरगांव में एक और नए प्रोजेक्ट को पूरा किया है। उस मियावाकी जंगल का नाम उन्होंने रखा है “पुलवामा शहीद वन”। यह वन पुलवामा में शहीद हुए सैनिकों की याद में लगाया गया है।

नायर ने बताया कि 40 शहीदों के नाम पर उन्होंने 40000 पेड़ लगाए हैं। अर्थात् एक सैनिक की याद में 1000 पेड़। सभी पेङों को अलग-अलग पैच में लगाया गया है। कुछ वक्त पहले हीं उन्होंने इस प्रोजेक्ट को पूरा किया है। अब वह नए प्रोजेक्ट की तैयारी में है।

नायर और जैन द्वारा लगाए गए पौधों के पेड़ बनने की सफलता दर 99% है। इसकी वजह यह है कि वह सिर्फ पौधे लगाते हीं नहीं हैं बल्कि जंगलों को 3 वर्ष तक बच्चे की तरह अच्छी तरह से देखभाल भी करते हैं।

जैन के अनुसार उनकी टीम बहुत ही सिस्टमैटिक तरीके से कार्य करती है, जो इस प्रकार है:-

• सबसे पहले जगह का चुनाव किया जाता है तथा पता किया जाता है कि वह जगह पौधे लगाने लायक है या नहीं है।

• यदि बंजर भूमि है तो वहां पर खाद, कृषि अपशिष्ट और केंचुए जैसे सूक्ष्म जीव डालकर उपजाऊ बनाया जाता है।

• उसके बाद वह उसे उस क्षेत्र के वनस्पति को जानते समझते हैं। अर्थात् वह देखते हैं कि कौन सा स्थानीय पेड़-पौधा लगाया जा सकता है। मियावाकी जंगल तभी सफल है जब क्षेत्र के स्थानीय पेड़-पौधे लगाए जाएं।

• उसके बाद प्रतिदिन हर सुबह शाम उसमें पानी दिया जाता है। महीनों में ही पौधों का अच्छा विकास होने लगता है। लेकिन कम से कम 3 वर्षों तक इन पौधों की सिंचाई करनी पड़ती है। उसके बाद जैसे-जैसे पेङ बढ़ने लगते हैं वह सघन वन का रूप ले लेते हैं। पेड़ों के बीच की दूरी बहुत कम होने की वजह से सूर्य की रोशनी इनके जड़ों तक नहीं पहुंचती है। 3 वर्ष के अंदर ही इन पेड़ों की जगह बारिश के पानी को ऑब्जर्ब करना आरंभ कर देती है जिसकी वजह से भूमिगत जल का स्तर भी काफी बढ़ जाता है।

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नायर ने बताया कि 3 वर्षों के बाद इन पेड़ों को किसी भी प्रकार का देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती है या अपने आवश्यकता की चीजें खुद हीं पूरी कर लेते हैं। मियावाकी तकनीकी की सहायता से लगाए गए 1 शहर में काफी लाभदायक सिद्ध हो रहे हैं। उदाहरण के लिए मुंबई में जगह की बेहद कमी होने की वजह से अगर वहां भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों पर इस वन को लगाया जाए तो शहर को प्रकृति के बहुत करीब लाया जा सकता है। वहीं दीपेन जैन ने बहुत ही स्पष्ट भाषा में कहा है कि मियावाकी जंगल हमारे प्राकृतिक जंगल का कोई रिप्लेसमेंट नहीं है।

मियावाकी तकनीक से लगाए गए जंगल का यह अर्थ नहीं है कि आप प्राकृतिक रूप से बढ़े पेड़ों का हनन करें।

दीपक जैन कहते हैं कि प्रकृति के जंगलों को काटने का अधिकार किसी को भी नहीं है यदि कोई कहता है कि वह प्राकृतिक रूप से उगे बरसों पुराने 50 पेड़ को काटकर उसके बदले में 1000 मियावाकी की वन तैयार कर देगा तो यह बिल्कुल गलत बात है। प्राकृतिक रूप से उगे हुए पेड़ों को प्रकृति स्वयं देती है उसका मुकाबला कोई भी तकनीक नहीं कर सकता है। मियावाकी तकनीक कम समय में अपने शहर को हरा-भरा करने का एक माध्यम है।

दीपक जैन कहते हैं कि उनको 10 वर्षों में 100 करोड़ पेड़ों को लगाने का लक्ष्य है। इस मुहिम से अधिक से अधिक संख्या में जोड़ने के लिए वे इच्छुक लोगों को फ्री में मियावाकी तकनीक का ऑनलाइन प्रशिक्षण भी देते हैं। नायर और दीपक जैन जब भी पेड़-पौधे लगाते हैं तो वह क्षेत्र के स्कूल, कॉलेजों के छात्रों को अपने साथ लेते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी को भी इसके हुनर के बारे में जानकारी प्राप्त हो।

The Logically यह उम्मीद करता है कि आर के नायर और दीपक जैन का यह ख्वाब जरूर पूरा होगा। इसके साथ हीं उन दोनो को उनके कार्यों के लिये नमन करता है।

Swati Singh
स्वाति सिंह BHU से जर्नलिज्म की पढ़ाई कर रही हैं। बिहार के छपरा से सम्बद्ध रखने वाली स्वाति, अपने लेखनी से समाज के सकारात्मक पहलुओं को दिखाने की कोशिश करती हैं।

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