Without ploughing field Prajeet and Manga is growing crops by natural method of farming

खेती करने की प्रक्रिया में खेतों की जुताई करना एक अहम प्रक्रिया होती है। अगर हम बिना जुताई के फसले उगाना चाहे, तो फसल अच्छे तरीके से नहीं उग पाती। अपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक दंपती ऐसे भी हैं, जो बिना जुताई के खेती कर महीने के लगभग 50 हज़ार रुपए कमा रहे हैं।

अब तक 500 लोगों को किया प्रशिक्षित

हरिवर्त प्रजीत (Harivart prajeeth) और मंगयार्करासाय लीला ( Mangyarkarasay Lila) तमिलनाडु (Tamil Nadu) के रहने वाले हैं और प्राकृतिक खेती का अभ्यास करते हैं। अभी तक उन्होंने लगभग 500 लोगों को प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षित किया है। वे हर परिस्थिति में खेती करने के तरीके निकाल ही लेते हैं। जिस वक्त पूरा देश इस महामारी के वजह से अपने घरों में कैद रह रहा था, उस वक्त भी दोनों खेती में स्वयं को रमाए हुए थे।

वे मानते हैं कि पौधे हमारे अन्नदाता हैं और यह जगह हमारी खाद टोकरी है। वे दोनों भी कोरोना वायरस को लेकर काफी चिंतित हैं, पर यहां 100 प्रतिशत शुद्ध प्राकृतिक है। यह पूरी जगह ही जीवन है और हमारी शाश्वत शांति का स्रोत भी है।

Without ploughing field Prajeet and Manga is growing crops by natural method of farming

खेती के लिए नौकरी छोड़ने का किया फैसला

हरिवर्त प्रजीत तमिलनाडु के रहने वाले हैं। उन्होंने पुडुचेरी विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पीजी किया है। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करनी शुरू की पर गांव लौट कर खेती करने की चाहत ने उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। वहीं ‌गांव आने के बाद उनकी पत्नी
डॉ. मंगयार्करासाय लीला‌ ने भी उनका साथ दिया, जो पेशे‌ से डॉक्टर हैं।

शुरू की प्राकृतिक खेती

साल 2017 से उन्होंने प्राकृतिक खेती करना आरंभ किया। तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में डॉक्टर मंगा के पैतृक गांव रामनाथपुरम में 3 एकड़ का खेत है, जो उनकी जन्मभूमि रहा है। दोनों दंपती ने फुकुओका पद्धति का पालन करते हुए अपने खेत में कभी ना तो हल चलाते हैं और ना ही कोई उर्वरक, कीटनाशक का उपयोग करते हैं।

वे अपनी खेती में विशेष तरीके का उपयोग नहीं करते और बीज बोने के लिए प्रसारण विधि का प्रयोग करते हैं। वह मानते हैं कि जहां भी बीज गिरते हैं, वे अपना रास्ता खुद बनाते हैं और स्वाभाविक रूप से बढ़ते हैं। उन्हें अपने देशी किस्मों को उगाना आसान लगता है। पारंपरिक किस्मों की बीज को बचाना उनकी खेती का मुख्य उद्देश्य है।

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जंगली सूअरों के कारण बढ़ी उपज

प्रजीत बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार जमीन पर खेती करना प्रारंभ किया, तब उन्होंने तरबूज लगाएं। उन्होंने ऐसा सुना था कि कटे हुए तरबूज के बीज किसी काम के नहीं रह जाते है इसलिए उन्होंनेे उसे खेत में ही जंगली सूअरों के लिए छोड़ दिया। उस तरबूज को जंगली सूअरों ने खा लिया और अपने मल-मूत्र को खेत में छोड़ दिया। जिस वजह से अगले साल उन्होंने देखा कि तरबूज के पौधे अलग अलग जगहों पर अंकुरित हो रहे थे, जिसे देखकर बाकी किसान भी हैरान थे।

बिना जुताई करते हैं खेती

दोनों दंपती का कहना है कि वह गहरी जुताई की जगह गीली घास और गिरी हुई हरी, सुखी पत्तियों का प्रयोग करके मिट्टी की एक परत बना लेते हैं। उसके बाद बीज लगाते हैं। उनका कहना है कि ऐसा करने से हमें मिट्टी को काटना नहीं पड़ता है और बीजों की ग्रोथ के लिए भी उपयुक्त पोषक तत्व मिल जाते हैं। उनके खेती करने के तरीकों को जानने और समझने के लिए दूसरे किसान भी आते रहते हैं।

किसान शिवराम उन्हीं के गांव के हैं। वह बताते हैं कि हम सबने बहुत से तकनीकों का उपयोग किया है, जो ना तो केवल सस्ते हैं बल्कि खूब उपयोगी भी हैं।

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पक्षियों के लिए प्राकृतिक आवास

प्रजीत और उनकी पत्नी जब अपना काम खत्म कर लेते हैं, तब वह पक्षियों को एक पौधें से दूसरे पौधे की ओर जाते हुए देखते हैं। उन्होंने इस प्रक्रिया को मिट्टी की उर्वरता और बीज के गुणों को बढ़ाने का एक उपयुक्त तरीका माना है। उन्होंने अपने खेत पर एक छोटा सा जगह निर्धारित किया है, जो पक्षियों और कीड़ों के लिए एक प्राकृतिक आवास की तरह है।

प्रजीत अपने प्राकृतिक खेती को शुरू करने के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि ‘व्यक्तिगत कारण भी रहा है।’ उन्होंने बताया कि एक बार वह लंबे समय तक बीमार रहे। इलाज के बाद भी वह ठीक नहीं हो पा रहे थे लेकिन अचानक धीरे-धीरे उनमें सुधार होने लगा और वह ठीक हो गए। यह उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। हॉस्पिटल से आने के बाद उन्होंने कुछ अलग करने को सोचा। वह कहते हैं कि मैं प्रकृति के साथ जुड़ा रहना चाहता हूं, जो मुझे सुकून देता है। उन्होंने वर्ष 2015 में अपनी नौकरी छोड़ कर खेती करनी शुरू कर दिया।

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कमाई का नया स्रोत

प्रजीत और उनकी पत्नी ने मिलकर अपने खेतों में हरे चने, काले चने, मूंगफली, बाजरा, रोशेल, कटहल, केला, नारियल, अमरूद और कई अन्य सब्जियां भी उगाते हैं। उन्होंने बताया कि उनकी अमरूद की फसल अपने स्वाद के लिए स्थानीय लोगों के बीच खूब लोकप्रिय हैं। वे लोग सीजन समय हर दूसरे दिन लगभग 40 किलो अमरूद की बेचते हैं। अप्रैल में उन्होंने अमरूद के साथ ही नारियल, कद्दू , कटहल और केले लगभग ₹20,000 में बेचा। वह कहते हैं कि सब मिलाकर हम खेती से हर महीने ₹40,000 से ₹45,000 तक कमा लेते हैं।

इनकी ‘कुछ न करें खेती ‘ में व्यवसायों के लिए छोटे पर स्थानीय लोगों के लिए अवसर उपलब्ध हैं। वे लोग घर के बने मूंगफली के गोले, रागी के गोले, रोशेल जैन, मौसमी फल और सब्जियां, टी बैग और अन्य जड़ी बूटियों की ताज़ी टोकरियां तैयार करते हैं।

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