Sunday, September 19, 2021

कोरोना ने नौकरी छीन ली , तो बिहार के मजदूरों ने गांव में ही बल्ला बनाने का फैक्ट्री खोल दिया : आत्मनिर्भर भारत

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में अपने बल्ले बनाने के हुनर से  घर वापस आये प्रवासी मजदूर अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

Covid-19 को फैलने से रोकने के लिए 25 मार्च से पूरे भारत में लॉकडाउन हुआ। लॉकडाउन में दिए गए राहत से सभी रज्यो के बहुत से मजदूर अपने मूल राज्य में वापस आ गये। ये मजदूर अलग-अलग राज्यों में अपनी मेहनत और लगन से जिंदगी यापन कर रहे थे । इनमे से कई लोग ऐसे भी थे जिनमें हुनर की कमी नही थी ,ऐसे ही बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के कुछ मजदूर अपने बल्ले बनाने के हुनर के साथ घर वापस आ गये, और यही अपना काम शुरू कर जीवनयापन कर रहे हैं।

ये मजदूर जम्मू -कश्मीर के अनंतनाग, अवंतिपोरा और कजीगुंड मे बल्ला बनाने का काम करते थे ,लेकिन बिगड़े हालात को देख ये अपने घर आ गये।

पटना से लगभग 280 किलोमीटर उत्तर में स्थित पश्चिम चंपारण जिले के सहोदरा गांव में लगभग 15 प्रवासी मजदूरों ने अपने काम की शुरूआत की है। पारसौनी गाँव के अबुलेश अंसारी ने अनंतनाग में एक कारखाने में काम सीखा था और उनको ये सब काम बेहतरीन ढंग से आता था। उन्होंने पोपलर के पेड़ की लकड़ियों से बल्ला बनाना शुरू किया। पोपलर की लकड़ी से बनाया हुआ बल्ला काफी टिकाऊ होता है। महामारी के कारण होमगार्डन फैक्ट्री की स्थापना एक महीने पहले की गई थी और इसमें लगभग 50 बल्लों को शामिल किया गया था, जिनके  खरीदार भी मिल गए हैं। वो प्रत्येक बल्ले को 800 रुपये में बेचते हैं। छोटे स्तर पर कारख़ाने खुलने से वहां रहने वाले लोगों में उम्मीद जगी है और वो भी अब गांव में ही काम करने का अवसर तलाश रहे हैं । इस तरह उम्मीद किया जा रहा है कि बिहार का पश्चिम चंपारण क्रिकेट के बैट बनाने के लिए एक केंद्र के रूप में उभर सकता है क्योंकि पोपलर का पेड़ वहां बहुत ज्यादा मात्रा में है।

सौभाग्य से, उन्हें चिनार के पेड़ों के बड़े जत्थे भी मिले जो मानसून की बारिश के कारण उखड़ गए थे। काम करने वाले मिस्त्री का कहना है कि हम बल्ला को और बेहतर तरीके से निर्मित करेंगे और इसे एक बड़े स्तर पर करने की कोशिश भी करेंगे लेकिन, इन मजदूरों के लिए अभी भी पैसा एक बड़ी चुनौती है जिसके कारण वो मशीन खरीदने में असमर्थ हैं ।


एक प्रवासी कार्यकर्ता नौशाद आलम का कहना है कि , हम कश्मीर में एक दिन में 12 बल्ला बनाते थे। लेकिन यहाँ बारिश के मौसम के कारण , उपकरणों की कमी और सूखी लकड़ी की अनुपलब्धता होने से हमारे काम मे थोड़ी परेशानी है। लेकिन, हम इसमे काफी सुधार लायेंगे।

श्रमिकों ने वित्तीय सहायता के लिए सरकारी अधिकारियों से भी संपर्क किया है। गौनाहा ब्लॉक के CO राजू रंजन श्रीवास्तव ने कहा हम बल्ले के नमूनों से संतुष्ट हैं। हम उन्हें आवश्यक  मूल्य देने के लिए तैयार हैं।

Logically इनके कार्य की प्रशंसा करते हुए आमजन से अपील करता है कि आत्मनिर्भर भारत मुहिम का हिस्सा बनें और स्वरोजगार का अवसर तलाशें।