Sunday, December 5, 2021

घर के बेकार पड़े डब्बों और टूटी ग्लास में फ़ल और सब्जी की खेती करते हैं, छत और बालकनी में उंगाते हैं सबकुछ

जनसंख्या बढ़ोतरी के कारण हर जगह वृक्ष काट कर लोग अपने आवास के लिए घर बनाकर निवास कर रहें हैं। इस कारण पार्यवरण को अत्यधिक मात्रा में क्षति हो रही है। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए हमारे देश के बहुत से व्यक्ति जमीन के अभाव में अपने छत, बालकनी, आंगन, और टेरेस पर गार्डन का निर्माण कर पार्यवरण संरक्षण में अपनी छोटी-छोटी भूमिका निभा रहें हैं। उनमें से ही एक मुजफ्फरपुर के निवासी ‘गोविंद राकेश’ भी हैं, जिन्होंने ‘जैविक खेती’ कर पार्यवरण संरक्षण के लिए मिसाल कायम किया है।

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पर्यावरण संरक्षण के लिए हमेशा से है जागरूक

गोविंद बचपन से ही पेड़-पौधों में रूचि रखते थे। उनको शौक था पेड़ लगाने का। गोविंद झारखंड राज्य के कृषि विपणन पर्षद रांची के सूचना तकनीक विभाग से सेवानिवृत्त उप निदेशक थे। इन्होंने अपने घर के टूटे-फूटे गिलासों में फल,फूल और सब्जियां लगा कर उनका देख भाल करना शुरू किया। जब यह सचिव की नौकरी कर रहे थे, उस दौरान यह जिस क्षेत्र में कार्य करते थे, वहां सड़क के किनारे पौधे लगवाए।




2015 के बाद इन्होंने अपने शहर में टाइल्स का कारोबार शुरू किया। पर्यावरण से अधिक प्रेम होने के कारण इन्होंने अपने छत पर बगीचा लगाया। उन पौधों की देखरेख वे खुद हीं करते थे। सिंचाई के लिए इन्होंने अपने छत पर इर्द-गिर्द नल लगाए और उस नल की सहायता से उन पेड़ों की सिंचाई करने लगे। इन्होंने अपने छत पर फल के पौधों में आम, अमरूद, अनार, चीकू, केला और नाशपाती लगाएं। साथ ही सब्जियों में नेनुआ, कद्दू और बैगन भी लगाएं है।

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बेटे और परिवार वालों ने की मदद

गोविंद ने जो पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाए हैं, उसमें उनका साथ उनकी पत्नी कल्पना झा सहित बहु-बेटा और पोते -पोतियो ने भी दिया है। जब गोविंद कहीं काम के सिलसिले में चले जाते तो उस दौरान इनकी पत्नी उन पौधों की देखभाल करती है।

गोविंद और उनके परिवार ने पर्यावरण के लिए जो कार्य किया वह सराहनीय है। इसके लिये The Logically उन्हें सलाम करता है और अपने पाठकों से अपील करता है कि वह भी पर्यावरण संरक्षण में अपने योगदान दें।