Thursday, October 28, 2021

कभी 25 पैसे के लिए खुद स्कूल छोड़ना पड़ा था, आज सैकड़ों जरूरतमंद बच्चों को पढाने का बीड़ा उठा लिए: हरि विश्नोई

वर्तमान समय में शिक्षा कितनी जरूरी है ये सब जानते हैं। सभी को शिक्षा का महत्व बहुत अच्छे से समझ आता है। लेकिन फिर भी हमारे देश में अनेक ऐसे बच्चे हैं जो आज भी शिक्षा से वंचित हैं। छोटे-छोटे दुकानों में, सड़कों पर, किसी के घर में मजदूरी कर रहे बच्चे भी जब दूसरे बच्चों को स्कूल ड्रेस पहने, कंधे पर बैग लिए स्कूल जाते देखते हैं तब उनका भी मन करता है स्कूल जाने का, पढ़ने का। लेकिन वे ऐसा कर नहीं सकते क्योंकि उस मजदूरी से वे सिर्फ अपना पेट भर पाते हैं। तो ऐसे में वे नए स्कूल में स्कूल ड्रेस, नई किताबें, विद्यालय की फीस कहां से लाएं और अब तो दिन पर दिन विद्यालय की फीस इतनी बढ़ती जा रही है कि यह शिक्षा आम इंसान के बस की नहीं रह गई। लेकिन हमारे समाज में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इन बच्चों के पढ़ने की आस को पूरा करने की कोशिश करते हैं।

उन्हीं में से एक है यूपी के मेरठ जिले के रहने वाले हरि विश्नोई। ये पिछले दो वर्षों से “शिक्षा सेतु” मिशन चलाकर ऐसे ही बच्चों की शिक्षा पूरी करवाने की कोशिश में लगे हैं। वैसे तो हरि विश्नोई यूपी के गन्ना विकास विभाग में कार्यरत थे, लेकिन उन्होंने अपने रिटायरमेंट के बाद अपना समय इस नेक काम में लगाने का सोचा और जुट गए ऐसे बच्चों की तलाश में जो पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन पढ़ नहीं पाते हैं।

विश्नोई जी बताते हैं कि जब वे कक्षा 6 में थे तो स्कूल की फीस नहीं जमा करने पर उनका नाम काटकर हटा दिया गया था। उस वक्त स्कूल की फीस महज 25 पैसे थी। फिर भी उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और अच्छी खासी नौकरी भी पाई। लेकिन उनके मन में हमेशा यह बात रहती थी कि वैसे बच्चे जो ऐसे ही किसी कारण से या तो पढ़ाई कर नहीं पाते या अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं, उनके लिए कुछ कर सकूं। वर्ष 2014 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपने मित्र महेश रस्तोगी से कहा कि- “मुझे अपने जीवन काल में इतना पैसा तो ज़रूर जमा करना है कि उसके ब्याज से कम से कम दो बच्चे पढ़ सके।

फिर क्या था चल पड़ी शिक्षा सेतु की गाड़ी। जिसमें अनाथ, जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उन्होंने लेनी शुरू की। जिसके लिए इन्होंने एक कॉलेज के साथ साझा कर लिया जिसका नाम है “बाल्यराम बलभूषण शरण इंटर कॉलेज“। जिसमें नर्सरी से 12वीं तक की पढ़ाई होती है। और विश्नोई जी बताते हैं कि वहां के शिक्षक क्लर्क और प्रिंसिपल से वे जुड़े हुए हैं और किसी छात्र का नाम फीस की वजह से उस कॉलेज से कटने वाला हो तो वे तुरंत विश्नोई जी से संपर्क कर उन्हें यह जानकारी देते हैं। फिर शिक्षा सेतू इस काम के लिए आगे आती है।

विश्नोई जी बताते हैं कि उस बच्चे की पढ़ाई की जिम्मेदारी जब हम लेते हैं तो शुरुआत कॉलेज से करते हैं कि उस बच्चे की फीस में छूट दी जाए। फिर उस बच्चे के माता-पिता से संपर्क करते हैं कि उनसे जो भी बन सके 50रुपये या 100 रुपए वह उसमें दें और फिर शिक्षा सेतू बचे हुए फीस में अपना सहयोग देती है, जो भी उनसे बन सके। फिर भी फीस बाकी रह जाए तो किसी और की मदद लेते हैं। साथ ही वे बच्चों से एक फॉर्म भी भरवाते हैं। जिसमें उनके सारे डिटेल होते हैं और संकल्प भी करवाते हैं। जिसमें चार संकल्प होते हैं- (i) मैं राष्ट्र को सर्वोपरि मानूंगा/मानूंगी
(ii) पर्यावरण की रक्षा करूंगा/करूंगी
(iii) निरव्यस्नी रहूंगा/रहूंगी
(iv) जब मैं कमाने योग्य हो जाऊंगा/जाऊंगी तो कम से कम 2 जरूरतमंद बच्चों को ऐसे ही पढ़ा कर अपना ऋण चुकता करूंगा/करूंगी। ऐसा इसलिए ताकि ये शिक्षा सेतू की सेतू ऐसे हीं बनी रहे और ये चेन आगे बढ़ते रहे।

साथ हीं वे राइट टू एडुकेशन (RTE) के तहत भी बच्चों का रेजिस्ट्रेशन करवा उनकी पढ़ाई करवाते हैं। जिससे उस जरूरतमंद बच्चे को किसी प्राइवेट स्कूल में दाखिला मिल जाता है और नर्सरी से आठवीं तक की फीस माफ रहती है। साथ ही अगर बच्चा मेधावी है तो उसे नवोदय विद्यालय की तैयारी भी करवाते हैं ताकि उसकी 12वीं तक की पढ़ाई बिना शुल्क के हो सके। जिसमें वे बच्चों को किताबें देते हैं और कुछ शिक्षक फ्री कोचिंग क्लास चलाते हैं। साथ ही वे सरकारी योजनाओं का भी लाभ इन बच्चों को दिलवाते हैं। यूं तो सरकार की तरफ से बहुत सारी योजनाएं, कॉलरशिप आती रहती हैं। लेकिन जो बच्चे पढ़ तक नहीं पाते उन्हें इन योजनाओं की भी खबर नहीं होती है, तो शिक्षा सेतु उन्हें इन योजनाओं तक भी पहुंच जाता है। और 12वीं की पढ़ाई के बाद लीड बैंक से रोजगार की ट्रेनिंग भी दिलवाते हैं ताकि वे बच्चे रोजगार लेकर अपनी आगे की भी पढ़ाई कर सकें।

विश्नोई जी ने इस काम के लिए कभी किसी से डोनेशन नहीं मांगा बल्कि जिन्हें उनका काम पसंद आया वे खुद मदद के लिए आगे आए और उनसे भी वे पैसे खुद ना लेकर यह कहते हैं कि या तो आप विद्यालय जाकर किसी बच्चे की फीस में यह पैसा लगाएं या फिर किसी किताब या ड्रेस के दुकानदार से साझा कर उन्हें चेक दे दें। विश्नोई जी बताते हैं कि जब उन्होंने इसकी शुरुआत की थी तब वे सिर्फ दो लोग थे धीरे-धीरे 2 से 10 हुए, 15 हुए और आज लगभग 40 लोगों का एक व्हाट्सएप ग्रुप है जो इस काम में लगे हुए हैं। और इन 2 सालों में इन्होंने ऐसे ही लगभग 200 बच्चों को उनकी शिक्षा दिलाई है। अगर ये बच्चे भी किसी ऐसे ही बच्चों को शिक्षा दिलवातें हैं तो यह शिक्षा सेतु की गाड़ी कभी नहीं रुकेगी। और ये सेतू और भी लंबी होती जाएगी।