Wednesday, August 4, 2021

बचपन से ही नेत्रहीन बेटी ने मैट्रिक में किया टॉप, IAS बनने के लिए कर रही हैं प्रयास

प्रकृति ने हमें दो आंखे दी है जिससे हम सारी दुनिया की खूबसूरती को देखते और उसका आनंद लेते हैं। लेकिन ऐसे बहुत से इंसान हैं जिनके पास ये बहुमूल्य आंखें नहीं हैं। सोंचिये फिर उन्हें क्या दुनिया की खूबसूरती दिखाई देती होगी?? लेकिन वह अपनी इस तकलीफ़ को दूसरों के सामने नहीं आने देते। अपने हिम्मत और मेहनत से सबको दिखातें हैं कि वे भी अपनी लगन से परीक्षाओं में पास ही नहीं बल्कि टॉप भी हो सकते हैं।

आज की यह कहानी एक ऐसी दृष्टिहीन लड़की और लड़के की है, जो ना केवल 10वीं में टॉप कियें बल्कि IAS भी बनना चाहते हैं और उनकी कोशिश जारी है। आइए पढ़ते हैं इनकी कहानी।

दृष्टिहीन ईशा खत्री

ईशा खत्री जो बाड़मेर की निवासी है। नेत्रहीन है। इनके जन्म के दौरान इनके माता-पिता को बहुत चिंता हुई कि मेरी बेटी नेत्रहीन है तो इसे आगे बहुत सारी तकलीफों का सामना करना पड़ेगा। जब यह बड़ी होने लगी उसे पढ़ाई में मन लगता, वह पढ़ना चाहती थी। इनके पिता का नाम सुरेंद्र कुमार एवं माता का नाम पदमा देवी है। जब ईशा के पिता को पता चला कि नेत्रहीन बच्चों की पढ़ाई ब्रेल लिपि से होती है, तो उन्होंने वह स्कूल ढूंढना शुरू किया। उन्हें बाड़मेर के निकट ही सत्यसाईं मुक बधिर विद्यालय में ईशा का एडमिशन कराया।

पिता को इस बात की खुशी हुई कि अब उनकी बेटी पढ़ेगी और कुछ बनेगी। ईशा अपनी आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई वहीं से संपन्न की। फिर यह चिंता हुई कि वह आगे की पढ़ाई कैसे करें ??? ईशा ने कहा कि मैं सामान्य बच्चों की तरह उनके स्कूल में ही पढूंगी। फिर इनके पिता ने स्टेशन रोड के पास महात्मा गांधी उच्च विद्यालय में एडमिशन कराया। इन्होंने वहां पूरी लगन से पढ़ाई की और 10वीं में बेहतर रिजल्ट ने इनके पैरेंट्स की सभी परेशानियों को दूर कर दिया। सामान्य बच्चों के साथ पढ़कर इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बाद ईशा की आत्म संकल्पना बढ़ी और उसने निश्चय किया कि वह आईएस बनेगी और देश की सेवा में अपना योग्यदान देंगी।

दृष्टिहीन मूलाराम

दृष्टिहीन मूलाराम सवाई पदमसिंह गांव के निवासी है। इनके पिता किसान और माता गृहणी हैं। उनके पिता का नाम भोलाराम और मां कमला देवी हैं। जब इनके माता-पिता को पता चला कि इनका बेटा नेत्रहीन है इसे दिखाई नहीं देगा, तो इस बात को लेकर बहुत चिंता हुई। अब आगे इसके साथ क्या होगा। फिर इन्हें पता चला कि बाड़मेर के पास एक नेत्रहीन विद्यालय है जिस विद्यालय में ईशा पढ़ी थी, वही। वहां इन्होंने इनका एडमिशन कराया और वहां वह पढ़ाई करने लगे। आठवीं कक्षा को संपन्न कर यह में दसवीं कक्षा के लिए महात्मा गांधी हाई स्कूल में एडमिशन कराएं और उन्होंने वहां जमकर पढ़ाई की। सामान्य बच्चों की अपेक्षा इन्हें डिस्टिंक्शन मार्क्स प्राप्त हुए। यह भी चाहते हैं कि वह प्रशासनिक सेवा का कार्य करें।

इन दोनों दृष्टिहीन बच्चों की 10वीं में अच्छे रिजल्ट के लिए The Logically बहुत सारी शुभकामनाएं देता है और उम्मीद करता है कि ये दोनों अपने सपनों को जरूर पूरा करेंगे।