जिसने 72 घंटे में अकेले मार गिराये 300 चीनी सैनिक। पढ़िए उस भारतीय सैनिक की वीरता की अनूठी कहानी

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आज भारत और चीन के बीच संघर्ष जारी है, चीन से सटे बॉर्डरों पर तनाव है। ऐसे में भारत के वीर सपूत जसवंत सिंह रावत का जिक्र बेहद जरूरी है। गुरू गोविंद सिंह जी ने एक नारा दिया था “सवा लाख से एक लड़ाऊँ” इस कथन को चरितार्थ करते हुए जसवंत सिंह रावत जी ने 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में महज 72 घंटों में अकेले करीब 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया था। आज चीन की तरफ से भारत पर बनाए जा रहे दबाब और युद्ध की धमकियों के बीच उपजे हालातों में चीन को जसवंत सिंह रावत की वीरता को पढने की जरूरत है। आईए जानते हैं जसवंत सिंह रावत की वीरता की अद्भुत कहानी…

भारत माँ के महान सपूत जसवंत सिंह रावत का जन्म 19 अगस्त 1941 को उत्तराखंड के ग्राम-बाड्यूं, पौड़ी गढवाल में हुआ था। बचपन से हीं उनके अंदर देशप्रेम का प्रवाह था। उनमें अपने देश की सेवा और मातृभूमि की रक्षा की इतनी तत्परता थी कि वे महज 17 वर्ष की आयु में सेना में भर्ती होने के लिए चले गए थे। सही उम्र नहीं होने की वजह से उस वक्त उन्हें सेना में भर्ती नहीं किया गया। जब उनकी उम्र सेना में भर्ती लायक हो गई उन्हें सेना में नियुक्त कर लिया गया और जसवंत सिंह रावत देश की रक्षा में खुद को समर्पित कर दिए।

जब चीन ने अरूणाचल प्रदेश पर कब्जा जमाने के लिए हमला किया उस वक्त भारत के सीमा पर सेना तैनात नहीं थी। जिसका फायदा उठाकर चीनी सेना ने पुरजोर हमला कर दिया। चीनी सेना को रोकने हेतु भारत की तरफ से 4 बटालियन को वहाँ भेजा गया। जसवंत सिंह रावत भी उसी फौज के एक सदस्य थे। भारत उस वक्त रक्षा के दृष्टिकोण से सशक्त नहीं था। जो भारतीय सैनिक चीनी सैनिकों को रोकने गए थे उनके पास पर्याप्त हथियार और गोला-बारूद नहीं थे जिसके कारण सैनिकों को वापस बुलाने का निर्णय लिया गया। सरकार के इस आदेश के बाद गढवाल राफल्स के जवान वापस लौट आए लेकिन उनमें से तीन जवान जसवंत सिंह रावत, लांस नाइक त्रिलोकी सिंह नेगी और रायफल मैन गोपाल सिंह गुसाईं ने वापस आने से इनकार कर दिया। उसके बाद जसवंत सिंह जी ने अपने दोनों साथियों त्रिलोकी सिंह और गोपाल सिंह को वापस भेज दिया और खुद नूरानांग पोस्ट पर अकेले रहकर चीनी सैनिकों को रोकने का फैसला किया। उनके अदम्य साहस का अंदाजा उनके इस फैसले से हीं लगाया जा सकता है कि एक तरफ चीन की हजारों सैनिक और दूसरी तरफ जसवंत सिंह रावत अकेले।




 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया 

जब जसवंत सिंह ने वहाँ अकेले रहकर चीनी सैनिकों को रोकने का फैसला किया। वहाँ उनके साथ कोई नहीं था। जसवंत सिंह ने अकेला हीं मोर्चा संभाल लिया। उन्होंने अपनी बहादुरी के साथ चतुरता का परिचय देते हुए अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग रायफल्स रख दी। उन्होंने अलग-अलग जगहों पर जा जाकर इस तरह फायरिंग करना शुरू किया जिससे चीनी सैनिकों को यह लगा कि उधर पूरी बटालियन मौजूद है। जसवंत सिंह जी अपनी बहादुरी और चालाकी से युद्ध कर रहे थे। उनके खाने-पीने और रसद की आपूर्ति वहाँ की दो महिलाएँ शैला और नूरा कर रहीं थी। जसवंत सिंह लागातार मोर्चा संभाले हुए थे और चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार रहे थे। 3 दिन बाद चीनी सैनिकों ने नूरा को पकड़ लिया और शैला पर ग्रेनेड से हमला कर दिया जिससे उसकी मौत हो गई। बाद में चीनी सैनिकों ने नूरा को भी मार दिया। अपने कृत्य और शहादत से शैला और नूरा सदा के लिए अमर हो गईं। जसवंत सिंह रावत ने अपने अदम्य हौसले और अनूठी वीरता का परिचय देते 72 घंटों में 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया !

नूरा और शैला की शहादत के पश्चात उन्हें रसद की आपूर्ति खत्म हो गई फिर भी वे अन्त तक डटकर मुकाबला करते रहे। 17 नवम्बर 1962 को उन्होंने खुद को गोली मार ली। चीन के सैनिक जब जसवंत सिंह के पास पहुँचे तो उन्हें पता चला कि 3 दिन से उनके साथ कोई बटालियन युद्ध नहीं कर रहा था बल्कि अकेले जसवंत सिंह रावत थे जो उनसे युद्ध कर रहे थे। यह जानकर चीनी सैनिक बेहद हैरान थे। चीनी सैनिकों ने जसवंत सिंह रावत का सर काटकर उसे अपने देश लेकर चले गए। 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा कर दी गई जिसके बाद चीनी कमांडर ने ना सिर्फ जसवंत सिंह रावत की शीश भारत को लौटाया बल्कि उनकी बहादुरी को सलाम करते हुए सम्मान स्वरूप कांस की उनकी एक मूर्ति भी भेंट की

जसवंत सिंह की स्मारक जहाँ उनकी सेवा में समर्पित हैं कई  सेवाएँ

जिस जगह पर जसवंत सिंह ने चीनी सैनिकों को मार गिराया था उस स्थान पर उनके नाम से एक मंदिर बनाया गया है। इनके नाम पर नुरानांग में एक जगह भी है जिसका नाम जसवंत गढ है। वहाँ पर जसवंत सिंह रावत का बहुत बड़ा स्मारक है। उस स्मारक में उनके हर एक चीज को संभाल कर रखा गया है। उनके कपड़ों को प्रतिदिन प्रेस किया जाता है, उनके बूटों पर प्रतिदिन पॉलिश करी जाती है इसके साथ-साथ प्रतिदिन सुबह , दोपहर और रात को खाने की पहली थाली जसवंत सिंह जी को परोसी जाती है। वे भारतीय सेना के एकमात्र ऐसे जवान हैं जिन्हें मरणोपरांत पदोन्नति दी जा रही है वे आज कैप्टन के पोस्ट पर हैं जिसकी पूरी सैलरी उनके परिवार वालों को दी जाती है। ये सारी सुविधाएँ और सम्मान उनकी वीरता की अनन्त कहानी का परिचायक है।

The Logically महान सपूत और देशभक्त जसवंत सिंह रावत जी को कोटि-कोटि नमन करता है

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