Thursday, October 29, 2020

जंगली रास्तों से गाड़ी नही जा सकती तो सरकारी स्कूल के शिक्षक ने बैलगाड़ी से बच्चों तक किताब पहुंचा दिया !

हमारे देश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा हमेशा ही सुर्खियों में रहती है। टूटे बेंच , पुरानी दीवारें, उजड़े छत और नदारद शिक्षक, सरकारी स्कूल के पहचान बन चुके हैं । जहां एक तरफ भारत की आबादी के 70 फीसदी से भी अधिक बच्चे सरकारी स्कूलों से अपनी जिंदगी सँवारने के लिए आश्रित हैं, वही इन स्कूलों की दुर्दशा उनके सपने पर पानी फेरने में कोई कसर नहीं छोड़ती।

इन सबके बीच इसी सरकारी व्यवस्था में कुछ ऐसे भी शिक्षक हैं जो अपनी मेहनत और शिक्षा परिवर्तन के जुनून को लेकर अपने स्कूल का ढांचा कुछ इस तरह बदल चुके हैं की वहाँ की चाल ढाल देखकर यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता यह एक सरकारी विद्यालय ही है।

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के शिक्षक नीरज सक्सेना को आजकल एक उदाहरण के तौर पर याद किया जा रहा है । इन्होंने सरकारी स्कूल की कायापलट कुछ इस तरह की है कि आम जन से लेकर सरकार ने भी इनके कार्य को सराहा है।


नीरज सक्सेना सालेगढ़ गांव के प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक हैं । सलेगढ़ एक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है और यहाँ पढ़े लिखे लोगों की संख्या बहुत ही कम है । ऐसे परिवेश में लोग हतोत्साहित होकर हार मान जाते हैं लेकिन नीरज सक्सेना अपने स्कूल की दशा को सुधारने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं , जो उल्लेखनीय है। नीरज सक्सेना के कार्य को हाल ही में खूब सराहना मिली जब उन्होंने अपने स्कूल के बच्चों के लिए बैलगाड़ी पर किताब लादकर जंगल का सफर तय किया और उन्हें किताब उपलब्ध करवाए।

नीरज सक्सेना के कार्य की सराहना करते हुए इस्पात मंत्रालय ने उन्हें अपना ब्रांड एंबेसडर घोषित कर दिया है और अब उनपर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने का कार्य भी कार्य शुरू किया गया है।

नीरज, सन 2009 से सालेगढ़ गांव के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा दे रहे हैं । यह विद्यालय जंगल के किनारे स्थित है ,शुरुआती दिनों में इस विद्यालय में केवल 15 विद्यार्थी हुआ करते थे और वह भी बहुत मुश्किल से विद्यालय आते थे । विद्यालय में ना ही बच्चों का रुचि था और ना ही उनके माता-पिता इन्हें पढाने के लिए सजग थे। धीरे-धीरे नीरज सक्सेना ने वहां रहने वाले लोगों को शिक्षा के महत्व के बारे में समझाना शुरू किया , इनकी अथक प्रयास से वहां रहने वाले ग्रामीण लोग अपने बच्चों को धीरे-धीरे विद्यालय भेजना शुरू किए । आज सालेगढ़ प्राथमिक विद्यालय में 94 बच्चे हैं जो निरंतर रूप से वहां शिक्षा ग्रहण करते हैं। एक समय सालेगढ़ का नाम जंगल ,पत्थर और गुंडागर्दी के लिए लिया जाता था लेकिन आज उस गांव को वहां के आदर्श विद्यालय के लिए जाना जाता है । नीरज जैसे शिक्षकों का कार्य सराहनीय है इनके जैसे शिक्षकों से आम जन को बहुत उम्मीद रहती है।

नीरज के कार्य का Logically नमन करता है और इनके बेहतर भविष्य की शुभकामनाएं देता है !

Prakash Pandey
Prakash Pandey is an enthusiastic personality . He personally believes to change the scenario of world through education. Coming from a remote village of Bihar , he loves stories of rural India. He believes , story can bring a positive impact on any human being , thus he puts tremendous effort to bring positivity through logically.

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