Wednesday, December 2, 2020

पौराणिक मान्यताओं को मानने वाले यह रहस्यमयी 12 गांव जो पूर्ण रूप से हैं आत्मनिर्भर :पातालकोट

मध्यप्रदेश के पातालकोट मे 12 गाँव छोटे छोटे हैं जो सम्पूर्ण तरीके से “आत्मनिर्भर” गाँव हैं। इस गाँव में हर वक्ति को सिर्फ नमक खरीदने के लिए बाहर जाना पड़ता हैं। सतपुड़ा के जंगल को पातालकोट, 12 गाँव के नाम से जाना जाता है। यहाँ के रहने वाले आदिवासी समाज हर तरीके से “आत्मनिर्भर” है।

छिंदवाड़ा जिले से लगभग 75 किलोमीटर दूर सतपुड़ा के पर्वत-पठारों के बीच में स्थित जंगल के 1700 फीट नीचे पातालकोट बसा है, जो 79 वर्ग किलो मीटर मे फैला है। यहां रहने वाले भारिया आदिवासियों का समाज 12 गाँव मे निवास करते है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि भगवान शिव की आराधना करने के बाद प्रिंस मेघनाथ इसी रास्ते पाताललोक चले गए थे , जिस कारण इस जगह का नाम पातालकोट पड़ गया ।


पातालकोट के जंगलो में मुख्य रुप से आचार, ढाक, महुआ, आवला, सागौन, और चिरौंजी जैसे विभिन्न तरह के पेड़ पौधे होते है । यहां का समाज अभी भी परम्परागत घरों में रहते हैं जिसका छत खपरैल और दीवारे मिट्टी के बने होते हैं। यहां के लोग अपना जीवनयापन वनों मे उपजे साग सब्जियों और फलों को खाकर करते हैं। शताब्दियों से यहां की झड़ी बूटी बहुत प्रसिद्ध है , जिनका उपयोग दवा बनाने के लिए किया जाता है ।

यहाँ के कई गांव मे पहुंचना आज भी बहुत मुश्किल है। विशाल पहाड़ियों से घिरे और जमीन से बहुत नीचे होने की वजह से सूरज के प्रकाश की किरने बहुत कम समय के लिए देर से पहुंचती है। पहाड़ों से बहने वाली जलधाराएं और झड़ने ही यहां पीने का एकमात्र साधन हैं और वह भी बदलती परंतु जलवायु परिवर्तन के कारण हमेशा उपलब्ध नही होता।

यहां रहने वाले लोगों का ईष्वरीय शक्ति पर बहुत भरोसा है और उनका मानना है कि यहां की ज़िंदगी स्वर्ग जैसी है । अपनी आम जरूरतों के अलावा वो अपने घरों मे और कुछ नहीं रखते है। हर वक्ति के घर के सामने एक खेत है, उस खेत मे वो अपनी जरूरत के लिए सब्जी और अनाज उपजा लेते हैं और उसी से अपना भरण पोषण करते हैं । वे सूखे और गिरे हुए पेड़ों को काटकर उसका उपयोग जलावन के लिए करते हैं। ये भूलकर भी हरे पेड़-पौधों को कभी हानि नही पहुचाते, ये इनको अपनी धरोहर मानते हैं। यहां 12 गांव हैं जो – घटनलिंग, घाना, हरकिछार, गुढ़ीछातरी, पचगोल, रातेड, सहरा, झिरनपलानी, चमटीपुर, सूखाभांड, गैलडुब्बा, घुरनीमालनी और गुंजाडोंगरी।

समाज से पूरी तरह से कटने के कारण यहां रहने वाले बच्चे अब स्कूल जाना शुरू किए हैं , जिससे पातालकोट के लोगों की ज़िंदगी मे बदलाव के आसार दिख रहे हैं।

Khusboo Pandey
Khushboo loves to read and write on different issues. She hails from rural Bihar and interacting with different girls on their basic problems. In pursuit of learning stories of mankind , she talks to different people and bring their stories to mainstream.

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