Wednesday, December 2, 2020

माँ मजदूर और पिता मोची, बेटे ने आज खड़ी कर दी है 500 करोड़ की कम्पनी जिसमें 4500 लोग काम करते हैं

हमारे देश में अक्सर लोग इस बात पर विश्वास करते हैं कि अगर माता-पिता का दौलत हो तो ही कोई बच्चा सक्सेस हो सकता है। कुछ हद तक यह बात तो सही है “अगर पेड़ का जड़ मजबूत होगा तो तना भी मजबूत ही होगा।” लेकिन एक सच यह भी है कि हर किसी को यह मजबूत जड़ विरासत में नहीं मिलती। अच्छी बात यह है कि हमारे देश के युवा अपने दम पर भी ख़ुद को इस काबिल बना लेते हैं कि आने वाले युवा पीढ़ी को इनका उदाहरण दिया जाता है।

आज की यह कहानी एक ऐसे शख्स की है जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में बहुत ही संघर्ष किया है और आज के समय में 5 सौ करोड़ का कारोबार स्थापित कर चुके हैं। अब करीब 5 हज़ार के लोगों को रोजगार दे रहें। सफलता के पीछे की कहानी कुछ इस कदर है कि इनके पिता मोची थे और मां जीवन-यापन के लिए देहाड़ी मजदूरी किया करती थी। तो आईये पढतें हैं इनकी सक्सेस स्टोरी

अशोक खाड़े का परिचय

हमारे समाज में जातिवाद बहुत ज्यादा है। आय दिन लोग इसी बात को लेकर लड़ाई झगड़ा और मन मुटाव कर लेतें हैं। हिन्दू मुस्लिम को गलत बोलतें है और मुस्लिम हिन्दू को। ऐसे ही बड़े कास्ट के लोग छोटे कास्ट को और छोटे कास्ट के लोग बड़े कास्ट को गलत ठहराते हैं। लेकिन जो इन रूढ़िवादी बातों और भेदभाव को पीछे छोड़ता है वही आगे बढ़ता है। अशोक खाड़े (Ashok Khade) उनमें से ही एक हैं। इनका का जन्म Maharastra के एक गांव में हुआ। इनकी मां दिहाड़ी मजदूरी किया करतीं थी और पिता मोची का कार्य किया करतें थे। एक विशेषता इनमें थी कि इनका परिवार शिक्षा के महत्व को जानता था, जो इन्हें आगे लेकर गया और सफल होकर सबके लिए मिसाल बनें।

मां मजदूरी करती तो पिता चप्पल-जूते सिलते

इनका जन्म हरिजन परिवार में होने के कारण इन लोगों का पेशा था, मरे हुए जानवरों की खाल को उतारना और उनका व्यवसाय करना। लेकिन 6 बच्चे थे इस कारण इनके पिता को इनका पालन-पोषण करने में बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। जैसे-तैसे कर इनका गुजार चल रहा था। मां दिहाड़ी मजदूर करती और पिता मोची का काम करके अपना जीवन गुजारने लगे। यह मोची के कार्य के लिए मुंबई गए और वहां यह काम करने लगे। गरीबी इस कदर थी कि कभी-कभी इन लोगों को खाली पेट ही सोना पड़ता। मुंबई में चित्रा टॉकीज के पास जो पेड़ है उस पेड़ के नीचे इनके पिता मोची का काम किया करते थे।


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शिक्षा का महत्व जानते थे

अशोक अच्छी तरह यह जानते थे कि शिक्षा का क्या महत्व है। वह यह भी जानते थे कि अगर मैं पढ़ा लिखा रहूंगा तो कोई अच्छी कार्य कर सकता हूं। उन्होंने अपनी शिक्षा सरकारी स्कूल से पूरी की और जब 10वीं की शिक्षा संपन्न हो गई तो वह मुंबई गयें और अपने पिता व भाई का काम में सहयोग करने लगें। जब यह मुंबई आए उस दौरान इनका भाई एक कंपनी में बिल्डर का काम करता था। अशोक ने सोचा कि क्यों ना मैं भी यह कार्य सीखूं और साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखूं। फिर अशोक उस कंपनी में काम करना शुरू कियें और अपनी पढ़ाई को भी जारी रखें। अशोक ने लगभग 15 साल से अधिक यहां काम किया। आगे इन्होंने सोचा कि एक कंपनी की शुरुआत करूं और फिर इसके लिए यह मेहनत करने लगे। अपनी संवाद कौशल और लोगों से संपर्क को बेहतर बनाने की कोशिश करने लगे। सन 1983 में यह जर्मनी गए और यहां उन्होंने एंटरप्रेन्योरशिप के तरीके को समझा और इसे ही अपनाया।

अपनी कम्पनी को किया शुरू

कहते हैं कि जिंदगी में मुश्किलें तो आती रहती है अगर आप उससे डर गयें तो समझिए कि आप हार गए। वैसे ही अशोक उन मुश्किलों से लड़ते रहे और अपनी सफलता की उपलब्धि को हासिल कर लिए। यह तीनों भाई साथ मिलकर एक कंपनी की स्थापना किए जिसका नाम “DAS OFFOSHORE” रखा गया। इस नाम का मतलब यह हुआ कि इसमें तीनों भाई अशोक, दत्ता और सुरेश हैं, इस कंपनी की शुरुआत 1995 में हुई। फिर इन्होंने तेल रिसाव का कार्य भी शुरू कियें। इनके ग्राहक के रूप में ह्युंडई, एसआर आदि शामिल है।

मंदिर, अस्पताल और स्कूलों का निर्माण

आज “दास ऑफशोर” कंपनी लगभग 500 करोड़ रुपए प्रत्येक वर्ष में कमा लेती है और इन्होंने लगभग 45 हजार से भी अधिक व्यक्तियों को रोजगार दिया है। इन्होंने अपने गांव में मंदिर अस्पताल और स्कूल का निर्माण भी करवाया है। हाल में यह अभी इंजीनियरिंग स्कूल भी बनवा रहें हैं ताकि यहां के बच्चे बेहतर शिक्षा प्रदान कर सफलता की ऊंचाई को प्राप्त करें।

अपनी सफलता की ख़ुशी सबके साथ साझा करने के लिए The Logically Ashok Khade को सलाम करता है।

Khusboo Pandey
Khushboo loves to read and write on different issues. She hails from rural Bihar and interacting with different girls on their basic problems. In pursuit of learning stories of mankind , she talks to different people and bring their stories to mainstream.

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