Wednesday, October 21, 2020

मेरी कहानी : शहर ने मुझे जीने का ज़रिया दिया लेकिन गांव तो ज़िन्दगी है

गांव को भारत का दिल समझा जाता है जहाँ से सनातन और संस्कृति की झलक पूरे राष्ट्र को भतृप्रेम में जोड़े रखने का काम करती है ।

भारत की 70% आबादी गांव में रहते हुए केवल देश को ही नही बल्कि विश्व के अलग अलग हिस्सों का पेट भरने का काम करती है जी हाँ , हम सबका पेट भरनेवाले अन्नदाताओं की भूमि गांव ही होती है । वैसे तो सभी गांव एक जैसे ही होते हैं जहां प्रेम , भाईचारा और आपसी सद्भाव का नमूना देखने को मिल सकता है । लेकिन दूरी अनुसार बिहार के अलग अलग गाँव मे विभिन्न संस्कृति को देखा जा सकता है । कहीं की भाषा आपका मन मोह लेगी तो कहीं का चालढाल , कहीं के आवभगत को आप दिल से नही निकाल पाएंगे तो कहीं का प्रेम आपको सरोबर कर देगा ।
मैंने अपना बचपन इन्ही गांवों की पगडंडियों पे बिताई है , जहां की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचती है । यहां का माहौल इतना सुखद और भाईचारा वाला की , कोई भी किसी के बच्चे को प्यार से पुचकार सकता है , गलती करते दिखने पर कोई भी किसी को डांट देता है । ऐसा लगता है जैसे सब अपने हैं । सन 1992 में मेरा जन्म छपरा जिले के ‘चोरौवा’ गांव में हुआ । बचपन की धूमिल यादों को अगर याद करूँ तो मुझे केवल प्रेम ही दिखता है । बचपन से ही अपने बाबूजी के साथ मैं चेंवर (खेत) मे जाता था , अपना फसल देखने । उस समय शायद मैं उस अनुभूति को नही समझ पाया था , लेकिन आज वह गर्व मैं महसूस कर सकता हूँ जो कभी मेरे बाबूजी महसूस करते थे । हमे धान के फसल का कटने के इंतज़ार रहता था । जब धान का बोझा खलिहान में रखा जाता था तो हमारे लिए तो मानो मज़े वाले दिन आ जाते थे , हम दिनभर अपने दोस्तों के साथ लुकाछिपी का खेल खेलते रहते थे । उस समय का खेल आज के खेल से बहुत ही अलग था , आज बच्चे मोबाइल पर लगे रहते हैं , किसी को किसी से मतलब नही रहता । लेकिन हमारे बचपन मे पूरे गांव के बच्चे इकठ्ठा हो जाते थे और हमारा खेल शुरू हो जाता था ।
दिनभर मिट्टी में रहना , कुछ भी कहा लेना , मां से डांट सुनना , बाबूजी के हांथो कभी कभी पीट जाना , इन सबके बीच का वह बचपन तनावमुक्त था ।
इसके साथ ही गांव से मेरी कुछ शिकायते भी रही हैं , यूँ कहूँ तो शिकायते गांव से नही बल्कि सरकार से रही हैं कि हमारे बचपन को एक बेहतर इंसान में ढलने के लिए शिक्षा की व्यवस्था बहुत ही दयनीय थी ।
मैं चोकर का बोरा लिए स्कूल जाता था , जिसे जमीन पर बिछाकर हम बैठ जाते थे । मास्टरसाहब पढ़ाते कम ,मारते ज़्यादा थे । आधुनिकता के नाम पर विद्यालय में ना ही पुस्तकालय था और ना ही पढ़ने का कोई और साधन । हां एक बात जो उस समय की सबसे खूबसूरत थी , हमें घर और विद्यालय , दोनों जगह संस्कार अच्छे मिले । आज भी गांव का वही संस्कार हमे दूसरो के प्रति झुकना सिखाता है ।
लेकिन 2020 के गांव में मैं बहुत सारे बदलाव देख रहा हूँ । हमलोग भी आधुनिकरण के बाज़ारीकरण के तरफ मुड़ रहे हैं । गांव का वह संस्कार मुझे धूमिल होते दिखता है जब कोई छोटा बच्चा किसी बड़े के सामने झुकने में संकोच करता है । रोजगार का अवसर तलाशने के लिए बहुत सारे लोग गांव से पलायन करने का रास्ता अपना चुके हैं , जो बहुत कम ही अपनी जमीन पर आ पाते हैं । शहरीकरण से हम इतना प्रभावित हो चुके हैं कि गांव छोड़कर शहर में ही रह जाते हैं । लेकिन आज भी मेरे जैसे बहुत लोग हैं जो गांव के लिए जीते हैं और गांव में ही कुछ करने का फैसला लेते हैं ।

गाँव जड़ है और यहाँ की जमीन से इश्क़ है । मेरी यह तम्मन्ना है कि इसी भूमि पर अपनी पूरी ज़िंदगी बिताऊं और यहीं राख बन जाऊं ।

Prakash Pandey
Prakash Pandey is an enthusiastic personality . He personally believes to change the scenario of world through education. Coming from a remote village of Bihar , he loves stories of rural India. He believes , story can bring a positive impact on any human being , thus he puts tremendous effort to bring positivity through logically.

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