खुद के लिए जिंदगी जीना तो कोई बङी बात नहीं लेकिन जो अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की सेवा में समर्पित कर दें वैसी कोई अगर हो सकती हैं तो वह मदर टेरेसा हीं हो सकती हैं। अपनी जिंदगी से कई लोगों को जीवन देना और खुद सेवा की पराकाष्ठा बन जाने का उदाहरण मदर टेरेसा से बेहतर नहीं हो सकता है। उनका पूरा जीवन परोपकार का प्रेरणा है जिससे कई लोगों ने खुद को प्रेरित किया है। आईए जानते हैं सेवा के क्षेत्र में बृहद मिसाल पेश करने वाली मदर टेरेसा जी के बारे में…

मदर टेरेसा का असली का नाम अगनेस गोंझा बोयाजिजू है ! उनके पिता एक व्यवसायी थे। मदर टेरेसा के बचपन में हीं उनके सर से पिता का साया उठ गया था। उस घटना के बाद मदर टेरेसा और उनके भाई-बहन के परवरिश के जिम्मेदारी उनकी माँ पर आ गई। मदर टेरेसा बचपन से हीं तेज तर्रार और परिश्रमी लड़की थीं। वह बचपन से हीं लोगों की सेवा करना चाहती थीं। जब वह 18 वर्ष की हुईं उन्होंने “सिस्टर्स ऑफ लोरेटो” में शामिल हो गईं ताकि वह अपना जीवन लोगों की सेवा में लगा सकें।

मदर टेरेसा बचपन से हीं लोगों की हर संभव मदद करती भी आईं। अपने पूरे जीवन को लोगों की सेवा में समर्पित करने के बारे में उन्होंने खुद लिखा है “वह 10 सितम्बर का दिन था जब मैं अपने वार्षिक अवकाश पर दार्जिलिंग जा रही थी। उसी समय अंतरात्मा से आवाज उठी कि मुझे सबकुछ त्याग कर देना चाहिए और अपना जीवन ईश्वर एवं दरिद्र नारायण की सेवा करके कंगाल तन को समर्पित कर देना चाहिए।

मदर टेरेसा का जन्म मानों लोगों की सेवा कर उन्हें जिंदगी प्रदान करने के लिए हीं हुआ था। पूरी तरह से समर्पित होकर मदर टेरेसा ने अपनी सम्पूर्ण जिंदगी को लोगों की सेवा में लगा दिया। वह सर्वप्रथम सिस्टर्स ऑफ लोरेटो से जुड़कर बच्चों को पढाती थीं। उन्होंने 1940 में कोलकाता में “मिशनरीज ऑफ चैरिटी” की स्थापना की 1948 में वे स्वेच्छा से भारतीय नागरिकता से ली थी। उनकी मान्यता रही कि प्यार की भूख रोटी की भूख से कहीं बड़ी है। वह बच्चों को पढाने के अलावा बीमार गरीब लोगों की सेवा करने लगीं।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में मदर टेरेसा का अमूल्य योगदान रहा। जिन बिमारियों को लोग छुआछुत मानते और बीमार लोगों के पास नहीं जाते वैसे लोगों को मदर टेरेसा सेवा करतीं। उन्होंने सेवा के लिए कभी भी किसी भी लोगों में कोई भेदभाव नहीं किया। अपने सेवा कार्य को निरन्तरता से करते हुए 1970 तक वे बहुत प्रसिद्ध हो गई थीं। वह अपने कार्यों को लगातार बढा रहीं थीं। संसार भर के कई देशों में कई मुद्दों पर लोगों के सेवार्थ वह कार्य कर रहीं थीं। अपने अंतिम समय तक वे विश्व के 123 देशों के 610 मिशन नियंत्रित कर रही थीं। उनके द्वारा जरूरतमन्दों के सेवार्थ किए जा रहे कार्यों के अंतर्गत स्वास्थ्य , शिक्षा , जागरूकता , भूखमरी आदि प्रमुख थे। एड्स , कुष्ठ और तपेदिक बिमारी से ग्रसित लोगों के लिए धर्मशालाएँ , भूखे लोगों को खाना खिलाना , विद्यालय , अनाथालय आदि कार्य प्रमुख थे।

भारत सरकार द्वारा मदर टेरेसा को 1962 में “पद्मश्री” और 25 जनवरी 1980 को भारत का सर्वोच्च सम्मान “भारत रत्न” दिया गया। 1979 में मानव कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर देकर अमूल्य योगदान देने के लिए उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया। उन्हें अलग-अलग वर्षों में कई देशों ने सदस्यता प्रदान की। 9 सितम्बर 2016 को वेटिकन सिटी में पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा को “संत” की उपाधि से विभूषित किया।

5 सितम्बर 1997 को हार्ट अटैक के कारण मदर टेरेसा जी का निधन हो गया। मदर टेरेसा अपनी कृत्यों और सेवा से प्ररेणा का एक ऐसा प्रकाश पूंज बनाया जो सदियों तक लोगों को प्रेरित करती रहेगी।

मदर टेरेसा ने जिस तरह अपने सम्पूर्ण जीवन को बेसहारों , जरूरतमन्दों व गरीबों की सेवा में समर्पित कर दिया वह अन्य लोगों के लिए प्ररेणा पूंज है। The Logically महान संत और समाजसेवी मदर टेरेसा जी को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धेय नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

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