Friday, December 4, 2020

अलग तरह के पपीते का बीज इस्तेमाल कर साल भर में 5 लाख का फसल बेचा यह किसान

मेहनत करने वाले व्यक्ति की कभी हार नहीं होती बशर्ते कि हमें अपने स्तर पर प्रयास जारी रखना चाहिए। जो व्यक्ति प्रयास करता है सफलता उसी को मिलती है। आज हम एक ऐसे व्यक्ति की बात करेंगे जिसने अपनी मेहनत से नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है।

परशुराम दास (Parshuram Das)

बिहार राज्य के भागलपुर जिले में स्थित रंगराचैक ब्लॉक के चापर गाँव के रहने वाले परशुराम दास ने अपने विश्वास से नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए उन्हें 10वीं में ही पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी। बहुत ही कम आयु में परशुराम की शादी हो गई और इसके बाद जल्द हीं बच्चे भी हो गए।

papaya farming

गुजारा करने के लिए गिरवी रखनी पड़ी जमीन

शादी के बाद जिम्मेदारी बढी। पूर्व से हीं आर्थिक भार झेल रहे परशुराम के लिए अब परिवार का खर्चा चलना भी मुश्किल हो गया था। परशुराम को अपना गुजारा करने के लिए केवल 5 बीघा जमीन थी। परंतु गुजारा ना हो पाने की वजह से परशुराम को यह जमीन भी गिरवी रखनी पड़ गई।

परशुराम के मित्र ने दी सलाह

परशुराम अपने मुश्किलों से इतना परेशान हो चुके थे कि उन्होंने अपने पड़ोस के एक मित्र को अपनी परेशानी के बारे में बताया। उनके मित्र उन्हें सलाह देते हुए कहा कि पपीते की खेती करो। मित्र की सलाह मानते हुए परशुराम ने पपीते की खेती करने को सोंचा।

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पपीते की खेती की शुरूआत

2011 में परशुराम ने अपनी गिरवी रखी जमीन को ही किराए पर लिया और उसमें पपीते की फसल लगा दी। उन्होंने कुछ अलग तरह के पपीते का इस्तमाल किया जैसे की पूसा नन्हा, चड्ढा सिलेक्शन, रेड लेडी व अन्य के साथ खेती शुरू कर दी। पहली बार में फसल खराब होने की वजह से परशुराम को कामयाबी हासिल नहीं हो पाई लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दूसरे प्रयास में सफलता उनके हाथ लगी।

Parshuram Das farming

परशुराम को हुआ मुनाफा

परशुराम ने बताया कि सब खर्च छोड़ कर उन्हें 5 लाख रुपए का लाभ हुआ। बहुत जल्द हीं उन्होंने अपनी जमीन को छुड़ा लिया और उस पर पपीते की खेती करने लगे। उनके इस सफलता को देखते हुए गाँव के दूसरे लोग भी पपीते की फसल की खेती करने लगे।

पपीते की फसल को साल में 3 बार लगाया जाता है। पहली बार फरवरी-मार्च में, दूसरी बार मानसून सीजन में और तीसरी बार नवंबर-दिसंबर में लगाया जा सकता है। पपीता का पेड़ लगाने के 3 से 4 साल तक लगभग 75 से 100 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार देता है, इसलिए पपीते की फसल से ज्यादा मुनाफा होता है।

पपीते की खेती भारत के अधिकतर राज्यों में होती है और लगभग सभी मंडियों में इसकी मांग है। भारत से हर साल लाखों टन पपीता एक्सपोर्ट भी किया जाता है। जो किसान पपीते की फसल उगाते हैं उन्हें अधिक मात्रा में सफलता प्राप्त होती हैं।

The logically परशुराम दास की हिम्मत की दाद देता हैं और उनकी कामयाबी के लिए उन्हें बधाई भी देता है।

प्रियंका ठाकुर
बिहार के ग्रामीण परिवेश से निकलकर शहर की भागदौड़ के साथ तालमेल बनाने के साथ ही प्रियंका सकारात्मक पत्रकारिता में अपनी हाथ आजमा रही हैं। ह्यूमन स्टोरीज़, पर्यावरण, शिक्षा जैसे अनेकों मुद्दों पर लेख के माध्यम से प्रियंका अपने विचार प्रकट करती हैं !

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