Tuesday, April 20, 2021

पराली का मिला उपाय: मात्र 20 रुपये के इस कैप्सूल से 90% पराली खाद में बदल जाती है

हाल ही में एक रिपोर्ट के अनुसार पता चला कि लॉकडाउन के बाद दिल्ली में प्रदूषण काफी तेजी से बढ़ गया है, जिससे वहां रहने वालों को काफी परेशानियां हो रही। क्यूंकि पराली से हमारे वातावरण में प्रदूषण की मात्रा अधिक बढ़ जाती है। लेकिन इस बात को सभी अनदेखा कर देते है, जो प्राणघातक साबित हो सकता है। पराली से होनेवाला वायु प्रदूषण सभी जीव-जन्तुओं के लिये बहुत अधिक हानिकारक है।

उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुयें भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इन्स्टीट्यूट) के द्वारा बनाया गया ‘बायो डीक्मपोजर’ पराली जलाने से फैलने वाले प्रदूषण से निपटने के लिये छिड़काव सफल हो रहा है।

केजरीवाल सरकार ने 13 अक्तूबर को पूसा इन्स्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के साथ दिल्ली में नरेला के हिरणकी गांव में 1 हेक्टेयर धान के खेत में 500 लीटर बायो डिकंपोजर का पहला छिड़काव कराया था। बायो डिकंपोजर छिड़काव के 15 दिन बाद आजतक की टीम ने पूसा इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों के साथ जायजा लेने पहुंचा। वैज्ञानिकों ने कहा कि 15 दिन में 90% पराली गलकर खाद में परिवर्तित हो चुकी है। दिल्ली में लगभग 2 हजार एकड़ में धान की खेती होती है। इस वजह से बड़ी मात्रा में पराली इकट्ठा होती थी। केजरीवाल सराकार ने 2000 एकड़ में बायो डीक्म्पोजर का छिड़काव करवाया था।

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Source- Aajtak

पूसा इंस्टिट्यूट की यह तकनीक

भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र ने पराली को खाद में परिवर्तित करने के लिये 4 कैप्सूल का पैकेट तैयार किया है, जिसकी कीमत 20 रुपये है। प्रधान वैज्ञानिक युद्धवीर सिंह ने बताया कि 4 कैप्सूल से छिड़काव के लिये 25 लीटर घोल बनाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल 1 हेक्टेयर में किया जा सकता है। सबसे पहले 5 लीटर पानी में 100 ग्राम गुड़ को उबालना है। ठण्डा होने के बाद उसमें 50 ग्राम बेसन मिश्रित कर कैप्सूल घोलना है। उसके बाद 10 दिन तक इस घोल को एक अंधेरे कमरे में रखना है। उसके बाद पराली पर छिड़काव करने के लिये पदार्थ तैयार हो जाता है।

घोल का छिड़काव पराली पर किया जाता है। 15 से 20 दिनों के अंदर पराली गलनी शुरु हो जाती है। जिसके बाद किसान अगली फसल की बुआई अच्छे से कर सकते हैं। आगे चलकर यह पराली पूरी तरह से खाद में परिवर्तित हो जाती है, जिससे खेती में फायदा होता है। 1 हेक्टेयर खेत मे छिड़काव करने के लिये 25 लीटर बायो डीकंपोजर के साथ 475 लीटर पानी मिलाया जाता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र के विज्ञानिकों के अनुसार किसी भी फसल की कटाई के बाद इसका छिड़काव किया जा सकता है। इस कैप्सूल से हर फसल की पराली खाद में परिवर्तित हो जाती है तथा अगली फसल में किसी प्रकार की समस्या नहीं होती है। कैप्सूल बनाने वाले वैज्ञानिकों ने प्रयाप्त कैप्सूल के स्टॉक का दावा किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार पराली जलाने से मिट्टी के पोषक तत्व जल जाते है तथा इसका फसल पर भी बुरा असर पड़ता है। युद्घवीर सिंह ने बताया कि यह कैप्सूल भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा बनाया गया है। यह कैप्सूल 5 जीवाणुओं को मिलाकर बनाया गया है, जिससे खाद बनाने की रफ्तार में तेजी आती है।

हिरणकी गांव में 28 अक्तूबर को पहुंची भारतीय कृषि अनुसंधान के प्रधान वैज्ञानिक लवलीन शर्मा ने बताया कि यह प्रयोग 100% सफल हुआ है। सही वक्त पर बायो डिकंपोजर का छिड़काव किया गया था। अभी तक 90% पराली गल चुकी है। खेत में जांच करने के बाद यह पाया गया कि पराली का एक भी निशान नहीं है। 15 दिन में ही पराली गल चुकी है। वहीं 13 अक्तूबर को खेत पराली से भरा हुआ था। यदि खेत के किसान चाहे तो खेती शुरु कर सकता है लेकिन खेतों में अभी पानी भरा हुआ है। पानी सूखने के बाद किसान आसानी से बुआई कर सकतें है।

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बायो डीक्म्पोजर का खेत में छिड़काव से होने वाले फायदे और नुकसान

इस प्रश्न के जवाब मे किसान सुमित ने बताया कि बायो डीक्म्पोजर के प्रयोग से सारी पराली गल चुकी है, तो कहीं हानी दिखाई नहीं दे रहा है। अभी खेत में पानी जमाव अधिक है और बुआई का समय भी अभी नहीं आया है क्यूंकि दिन में हल्की गर्मी होती है। 10 नवंबर तक खेत का पानी सुख जायेगा तथा मौसम ठंडा होने के साथ खेतों में बुआई किया जा सकता है।

लागत के प्रश्न पर सुमित ने कहा, “खेतों में बायो डीक्म्पोजर के छिड़काव में एक रुपये का भी खर्च नहीं आया है। पूरा खर्च सरकार ने उठाया है। हमें 15 दिन में यह छिड़काव सफल दिख रहा है और हम काफी संतुष्ट है।”

पूसा इन्स्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने आजतक की टीम के साथ वैसे खेतों का भी जयाजा लिया जिसमे बायो दिक्म्का छिड़काव नहीं किया गया था। किसान सुमित ने कहा कि जहां छिड़काव नहीं हुआ था वहां 2 बार जुताई करनी पड़ती थी। इसमे पानी का इस्तेमाल भी अधिक होता है, जिससे समय और पैसे का खर्च भी अधिक आता है। जिस खेत में बायो डीक्म्पोजर का छिड़काव नहीं होता वहां 3000 रुपये खर्च आता था, वहीं जिस खेत मे छिड़काव हुआ वहां सिर्फ बुआई में 1500 रुपये खर्च आएगा है।

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Source- Aajtak

खेत में बायो डीक्म्पोजर के छिड़काव होने से वहां खेती करना लाभप्रद होगा या नहीं?

इस सवाल के जवाब पर अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक लवलीन शर्मा ने बताया कि बायो डीक्म्पोजर जीवाणुओं का समूह होता है, जो फसल के अवशेष पर कार्य करता है। इन दिनों किसान खेत के अंदर ही खाद बनाने की मांग की करते है। बायो डीक्म्पोजर द्वारा पराली को खाद में बदलने के साथ-साथ भूमि में कार्बन, नाइट्रोजन और फास्फोरस की मात्रा बढ़ेगी। जब खेत मे गेंहू की बुआई होगी तब भी वैज्ञानिकों की टीम सैम्पल लेगी और बायो डीक्म्पोजर के छिड़काव से पहले और बाद के अंतर की रिपोर्ट भी दे सकेंगे।

क्या इस सफल प्रयोग के बाद पंजाब, हरियाणा जैसे राज्य सराकार को बायो डीक्म्पोजर के बारें में गंभीरता से विचार करना चाहिए?

इसके उत्तर में लवलीन शर्मा ने बताया कि “मुझे लगता है कि जब दिल्ली में किसानों को कामयाबी मिल रही है तो हमें किसानो के फोन आते है कि वे पराली नहीं जलाना चाहते हैं बल्कि बायो डीक्म्पोजर का इस्तेमाल करना चाहते हैं। किसान इस विक्लप का प्रयोग करना चाहते है। बाकी राज्य के सराकार को भी अपने राज्य के किसानों को इसके लिए प्रेरित करना चाहिए।”

Shikha Singh
Shikha is a multi dimensional personality. She is currently pursuing her BCA degree. She wants to bring unheard stories of social heroes in front of the world through her articles.

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