Tuesday, September 28, 2021

जिस सरकारी स्कूल में कभी ब्लैकबोर्ड भी नही था, वहां इस शिक्षक ने कंप्यूटर लगवा दिया: इन्हें मिल रहा है सम्मान

गुरु को हमारे देश में भगवान का दर्जा दिया गया है। आज भी हम हमारे शिक्षक को पूज्य मानते हैं। अगर कोई भी व्यक्ति सफल होता है तो उस शिक्षा के बल पर ही जो उसके शिक्षक ने दी है। शिक्षक हर सम्भव प्रयास करते हैं कि किसी भी हालात में उनका छात्र अपनी पढ़ाई जारी रखे। सरकारी स्कूलों और ग्रामीण शिक्षा के बारे में तो लोगों का बस एक ही ख्याल रहता है कि शिक्षकों का बस अपने वेतन आने का इंजतार करना। लेकिन ऐसे बहुत से सरकारी स्कूल और शिक्षक ऐसे भी हैं जिसे देख मन हर्षोल्लास से भर जाता है।

हम आपको ऐसे शिक्षक और उनके बच्चों से अवगत कराने जा रहें है जो अपनी पढ़ाई सेसंर पेंसिल और लैपटॉप से करतें हैं। इतना ही नहीं यहां के बच्चों का जेनरल नॉलेज में भी बहुत तेज है। इन्हें पढ़ाने वाले शिक्षक को पुरस्कार भी मिलें हैं।

टीचर अरविंद गुप्ता

हम जिस स्कूल और जगह की बात कर रहें हैं, वह स्कूल “मैनपाट में स्थित जामझरिया विद्यालय” है। यहां के शिक्षक सभी बच्चों को पढ़ाने के लिए कुछ-ना-कुछ नया करते रहतें हैं। जो शिक्षक इन बच्चों को पढ़ाते हैं उनका नाम है Arvinad Gupta. इनके बच्चे केवल पढ़ाई ही नहीं करते बल्कि अन्य स्कूलों के बच्चों से प्रतियोगिता कर उन्हें जेनरल नॉलेज में पछाड़ते भी हैं।

2008 में हुई नियुक्ति

पता नहीं क्यों मैनपाट के जामझरिया गांव में लोग दिन के वक़्त भी यहां आने से घबराते हैं। यहां स्थित Primary School में मात्र 10 बच्चे ही पढ़ते था जब वर्ष 2008 में अरविंद गुप्ता आयें। इन्होंने अपने लगन और इन्नोवेशन थिंकिंग के माध्यम से ऐसा किया कि यहां 50 से भी अधिक बच्चे हैं। यहां के ये बच्चे ना ही श्यामपट्ट और ना ही स्लेट पेंसिल से पढ़ते हैं। इनको पूरा बदलने के लिए अरविंद ने अपने पैसे खर्च कियें हैं। जब आप इन बच्चों को देखेंगे तो सेसंर पेंसिल और लैपटॉप से अध्ययन करते दिखेंगे। ये बच्चे राज्यस्तरीय स्कूल के बच्चों को जेनरल नॉलेज में हरा देतें हैं। इनके सामने वो बच्चे कुछ भी जवाब नहीं देते।


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हुई थी परेशानी

शायद ही कोई बिना मुश्किलों को झेले सफलता पा लेता है। अरविंद उनमें से एक हैं जिन्हें अपनी सफलता के लिए बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। यह गांव के बच्चों के पिता से अनुरोध कर उन बच्चों को स्कूल भेजने के लिए कहते हैं। यह अपनी मंजिल को पाने में लगें रहें और आखिरकार उनके पिता बच्चों को खुद स्कूल भेजनें लगें। आज इस स्कूल में 10 नहीं बल्कि 50 बच्चे हैं और रोज सभी स्कूल भी जातें हैं।

2 छात्राओं का सड़क सुरक्षा पर गीत

इस स्कूल में बच्चों को यूनिफॉर्म पहनकर पूरे नियमानुसार स्कूल जाना है। अगर शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहें हैं तो उस व्यक्ति की छवी जरूर दिखाई जाती है। इतना ही नहीं कोशिश यह होती कि बच्चों को हर क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त हो। ट्रैफिक नियमों के पालन के लिए यहां की 2 छात्राओं ने बेहतरीन प्रदर्शन कर गीत से सबको जागरूक किया है। अरविंद ने यह सिद्ध किया है कि कीचड़ में ही फूल खिलतें हैं। यह सभी शिक्षकों के लिए उदाहरण हैं जो गवर्मेंट टीचर के नाम पर स्कूलों में टाईम पास कर बच्चों का कल खराब करतें हैं।

मिलें हैं पुरस्कार

इनकी हौसला अफजाई और अपने मेहनत से स्कूल की कायापलट करनें के लिए इन्हें पुरस्कार भी मिलें हैं। इन्हें जिला स्तर पर कई अवार्ड मिलें हैं और राज्य सरकार को इन्हें राज्यपाल पुरस्कार के लिए भी बोला गया है।

स्कूल में 10 बच्चों से 50 को पढ़ाने और सरकारी स्कूल की कायापलट करने के लिए The Logically अरविंद को शत-शत नमन करता है।