Shrinivas Padakandla

कोई भी वाहन जैसे गाड़ी या स्कूटर अपनी आयु पूरी कर लेने के बाद आपके लिए एक कबाड़ (scrap) से बढ़कर कुछ नही रह जाता। ऐसे में उस वाहन का नया स्थान आपके घर का कौना या आपके घर के नज़दीक बनाया गया पार्किंग प्लेस न रहकर स्क्रैप मार्किट हो जाती है। जहां स्क्रैप डीलर उस कबाड़ा कार के तमाम पार्ट्स जैसे लोहा, प्लास्टिक, रबर आदि को अलग-अलग करके उनकी कीमत के हिसाब से बेच देता है।

लेकिन आपके लिए स्क्रैप बन चुके इन्हीं ऑटोमोबाइल व इलैक्ट्रोनिक वेस्ट पार्ट्स को अपने क्रिएटिव मांइड का प्रयोग करते हुए यदि कोई व्यक्ति हैरतअंगेज़ व खूबसूरत मूर्तियों (Sculpture)का निर्माण करे तो वाकई ये काबिले तारीफ होगा।

दरअसल, विजयवाड़ा (Vijaywada) के प्रोफेसर श्रीनिवास पादकंदला(Shrinivas Padakandla) ऑटोमोबाइल पार्ट्स और इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट के मलबे को एक स्क्रैप के रुप में न देखकर उसे रिसाइकल करते हुए बेहद रचनात्मक ढ़ग से प्रयोग कर रहे हैं और उसके द्वारा अनेक मूर्तियों व कलाकृतियों का निर्माण कर रहे हैं।

Sculpture

कौन हैं श्रीनिवास पादकंदला

आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा जिले स्थित गूंटूर में ललित कला कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर एंड प्लानिंग(Fine Arts of Architecture and Planning- Guntur) , आचार्य नागार्जुन विश्वविधालय (Acharya Nagarjuna University) के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर श्रीनिवास पादकंदला ऑटोमोबाइल स्क्रैप धातु का पुर्ननवीनीकरण करते हुए उन्हे मूर्तियों का आकार दे रहे हैं। श्रीनिवास ने 1998 में वाराणसी की बनारस हिंदु यूनिवर्सिटी(Banaras Hindu University) से मुर्तिकला व ललितकला में ग्रेजुएशन किया है। वहीं 2007 से 2010 तक हैदराबाद में वे पोट्टी श्रीरामुलु तेलुगु यूनिवर्सिटी(Potti Sriramulu Telugu University) में फैक्लटी मेंबर के रुप में पदासीन रह चुके हैं।

केवल एक सप्ताह में इस स्क्रैप को मूर्ति की शक्ल दे दी जाती हैः श्री निवास

वर्तमान में प्रोफेसर श्रीनिवास पादकंदला की टीम में 15 से 20 सदस्य काम कर रहे हैं जिसमें उनके जूनियर, सब-जनियर व स्टूडेंट्स शामिल हैं। The New Indian Express से हुई बात में श्रीनिवास कहते हैं- “ऑटोमोबाइल स्क्रैप को एक मूर्ति का आकार देने में केवल एक हफ्ते का समय लगता है। मेरी टीम के सदस्य सार्वजनिक स्थानों पर जाकर इस धातु सक्रैप का पुर्ननवीनीकरण करते हुए एक आकर्षक मॉडल बनाने में विशेषज्ञ हैं”

यह भी पढ़ें :- कोलकाता में कचरे और टायर से तैयार हो रहा है भारत का पहला ‘टायर पार्क’

नगर निगम की मदद से पार्कों में स्थापित किये गये हैं ये स्कल्पचर्स

वहीं Logical Indian से हुई बात में श्रीनिवास कहते हैं- “बड़े-बड़े होटलों, एक्ज़ीबीशन हॉल्स या सोफिस्टीकेटिड आर्ट गैलरीज़ में जाकर एक मध्यमवर्गीय परिवार विभिन्न प्रकार के प्रदर्शित धातु व अन्य कला रुपों का आनंद नही ले सकता। इन लोगों को ध्यान में रखते हुए हमने अपनी स्क्रैप धातु की मर्तियों को सार्वजनिक पार्कों में नगर-निगम की मदद से स्थापित किया है, आज हर आयु वर्ग व हरेक आय वर्ग का इंसान बिना किसी खर्च के इस कला का लुत्फ ले सकता है”

Sculpture

कई मूर्तिकला शिविरों में भाग ले चुके हैं श्रीनिवास

वर्ष 2007 से लेकर अब तक श्रीनिवास कई मूर्तिकला शिविरों में भाग ले चुके हैं। जिनमें 2007 और 2018 में ललित कला अकादमी और रिजनल सेंटर चेन्नई (Lalit Kala Akadmi and Regional Centre) द्वारा आयोजित अखिल भारतीय पत्थर पर नक्काशी (All India Carving Stone Camp) में अपनी मूर्तियों की प्रदर्शनी लगा चुके हैं। इसके अलावा 2016 में एपीशिल्पाराम्म आर्ट्स एंड कल्चर सोसाइटी(AP Shilparamam Arts and Culture Society) की ऑटोमोबाइल स्कल्पचर वर्कशॉप में भी भाग ले चुके हैं। इतना ही नही वे लोगों को विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध धातु स्क्रैप से कम लागत वाली मूर्तियां बनाने के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं।

जलवायु परिवर्तन की दिशा में भी अनुकूल हैं श्रीनिवास के स्कल्पचर

श्री निवास कहते हैं – “जब छात्र और अन्य लोग इन इको-फ्रेंडली मॉडल्स से प्रभावित होते हैं तब मुझे बेहद सुखद अनुभूति होती है कि वर्तमान में जब जलवायु परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा बन चुका है ऐसे में लोग हमारे काम को पसंद करते हैं ये एक अच्छी बात है”

कई क्षेत्रीय नगर-निगम अथॉरिटी द्वारा स्थापित किये गये हैं ये मॉडल्स

श्रीनिवास के इस कार्य से प्रेरित होकर अभी तक 2016 और 2018 में विजयवाड़ा नगर निगम नें इन मॉडल्स के साथ शहर को सुंदर बनाने के लिए प्रोफेसर श्रीनिवास से मदद ली। वहीं 2017 में गुंटूर नगर निगम, मदुरै नगर निगम, थूथूकूडी नगर निगम, अनंतपुर और 2018 में हिंदुपुर शहरी विकास प्राधिकरण और 2019 में ग्रेटर चेन्नई नगर निगम ने श्रीनिवास निर्मित इन स्क्ल्पचर्स को स्थापित करके अपने क्षेत्रों को सुंदर बनाया है।

अर्चना झा दिल्ली की रहने वाली हैं, पत्रकारिता में रुचि होने के कारण अर्चना जामिया यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर चुकी हैं और अब पत्रकारिता में अपनी हुनर आज़मा रही हैं। पत्रकारिता के अलावा अर्चना को ब्लॉगिंग और डॉक्यूमेंट्री में भी खास रुचि है, जिसके लिए वह अलग अलग प्रोजेक्ट पर काम करती रहती हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here