अगर हमें आगे बढ़ना है तो जिंदगी के हर मोड़ पर आये कठिनाइयों का मुस्कुराहट के साथ स्वागत करना पड़ता है। अगर हम डरकर पीछे हट गये तो उस मुकाम को हासिल नहीं कर सकते जहां सफलता की सीढ़ी पहुंचती है। जिंदगी में आये विषम परिस्थितियों का सामना भी सरलता से करना पड़ता है। कुछ व्यक्ति सामाजिक कार्यों से लोगों की मदद करने को अपनी सफलता मानते है। कुछ व्यक्ति शिक्षा की क्षेत्र में आगे बढ़ रहें हैं। वहीं कुछ पढ़े-लिखे लोग अच्छी खासी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ खेती की तरफ रुख कर रहें हैं। आज की यह कहानी गौ पालन की है। हमारे हिन्दू धर्म मे गाय को माता माना जाता है और इनकी पूजा की जाती है। हम गाय को गौ माता भी कहते हैं। इस बात पर विश्वास नहीं होगा लेकिन यह सत्य है कि एक इंजीनियर अपनी नौकरी छोड़ गौ पालन कर रहें है।

शंकर कोटियन

शंकर कोटियन (Shankar Kotian) कर्नाटक (Karnataka) के मूडबिद्री (Mudbidri) से सम्बंध रखते हैं। इन्होंने अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कंप्यूटर साइंस से पूरी की। यह पढ़ाई में अव्वल थे। आगे यह इंफोसिस (Infosys) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर (Software Engineer) के तौर पर कार्यरत हुयें। सप्ताह के लास्ट में वह अगल-बगल के इलाके में घूमकर देखते कि खेती और पशुपालन कैसे होता है। जब यह वहां जाते तो नई तकनीक के साथ हुए ये सारे कार्य ध्यान से देखते। नौकरी के दौरान वह अनेक देशों में भी घूमने गयें।

Infosys की नौकरी छोड़ी

शंकर 10 व्यक्तियों की अगवाई में कार्यरत थे। उन्हें अपनी नौकरी से अच्छी तनख्वाह मिल रही थी लेकिन वह अब एक ही तरह का काम करके उब चुके थे। इनके मन मे यह नौकरी छोड़ डेयरी फार्म के लिए विचार आया। वह खेती और पशुपालन करना तो चाहते थे लेकिन उन्हें इस विषय मे ज्यादा जानकारी नहीं थी।

शुरुआत हुई खेती और पशुपालन की

शंकर ने घर बनाने के लिए 2011 में मूडु-कॉनजे गांव के निकट 8 एकड़ भूमि खरीदी थी। जब उस भूमि पर ऑफिस के लिए घर बना तब उन्होंने वहां के किसानों से जैविक उर्वरक खरीद वहां की भूमि पर घास उगाई। फिर उन्होंने लगभग 5 गायें खरीदी और उनकी देखभाल करने लगें। इन्हें पशुपालन और खेती के विषय में जानकारी नहीं थी। इस कारण इन्हें पहले साल ये सब सीखने समझने में बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। शंकर 3 सालों तक यह सब अच्छी तरह सिख गयें। इनका फॉर्म ढलान पर होने के कारण बहुत फायदेमंद साबित हुआ। इन्होंने इसे विकसित किया। ग्रेविटेशनल फोर्स के कारण पशुओं का अपशिष्ट सरलता से खेतों में चला जाता।

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बायोगैस को किया तैयार

शंकर ने ढलान के निचले भाग में गायों की आवश्यकतानुसार “नेपियर घास” लगाई। शंकर ने ढलान के लास्ट में एक कुआं भी खुदवाया ताकि पानी को संचित किया जा सकें। इन्होंने डेयरी के निकट बायोगैस प्लांट का निर्माण भी करवाया ताकि ईंधन की बचत हो। इस बायोगैस से इनके परिवार और नौकरों को अधिक लाभ हुआ। यह अपना भोजन बायोगैस की मदद से ही बना लेते। इस कार्य के बाद जो भी गोबर बचता, शंकर उसे किसानों को बेचते उनकी सुपारी की खेती के लिए। यहां इन्होंने स्लरी से भी अधिक मात्रा में मुनाफा कमाया। शंकर लगभ 3 लाख लीटर स्लरी को बेच कर लाभ कमा चुके थे।

25 एकड़ है जमीन

शंकर ने अपनी मेहनत से तरक्की की और डेयरी के लिए 40 गायें हो गईं। अब वह प्रत्येक दिन 180 लीटर दूध सप्लाई करते हैं। यह दूध Karnataka Co-Operative Milk Federation Limited नंदिनी में भेजते हैं। साथ ही इन्होंने अपने खेतों में किनारे और बीच मे मिट्टी की नमी के लिए 1 हज़ार सुपारी और 18 सौ रबड़ के पेड़ लगायें हैं। इनके खेतों की हरियाली देखने योग्य है।

शंकर ने अपनी इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ खेती और पशुपालन की ओर रुख किए। इन्होंने अपने लगन से यह दिखा दिया कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता है। बस उस कार्य को करने की निष्ठा होनी चाहिए। The Logically शंकर की सराहना करते हुए उन्हें सलाम करता है।

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